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ईरान पर युद्ध में रूस एकमात्र विजेता: यूरोपीय संघ की घोषणा

ईरान पर अमेरिका-इजरायल हमले में रूस बना सबसे बड़ा लाभार्थी

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ते ही रूस को अप्रत्याशित लाभ मिलने लगा है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद, जहां पूरी दुनिया की नजर मध्य-पूर्व पर केंद्रित हो गई, वहीं रूस ने इस स्थिति से अपना फायदा उठाना शुरू कर दिया। यूरोपीय संघ के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इस संघर्ष में रूस एकमात्र ‘विजेता’ बनकर उभरा है।

तेल की कीमतें: रूस का मुख्य लाभ

ईरान के होरमुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक तेल बाजार में तूफान आ गया, जिससे रूस को अभूतपूर्व आर्थिक लाभ मिल रहा है। हमले के दिन ब्रेंट क्रूड की कीमत 72.87 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़कर 82 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।

  • रूसी यूराल क्रूड 62 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो मॉस्को के 2026 बजट में निर्धारित 59 डॉलर की बेंचमार्क से अधिक है
  • तेल और गैस राजस्व रूस के संघीय बजट का 30 प्रतिशत हिस्सा है
  • कार्नेगी रूस यूरेशिया केंद्र के अनुसार, यदि जलडमरूमध्य बंद रहे तो कीमतें 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं

यह स्थिति रूस की संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था के लिए एक वरदान साबित हुई है, जबकि यूरोपीय देशों को इसके विपरीत गंभीर आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

यूक्रेन युद्ध से विश्व का ध्यान हटना

रूस के लिए इस संकट का दूसरा और शायद अधिक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यूक्रेन युद्ध से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक ध्यान हट गया है। जब पूरी दुनिया ईरान-इजरायल संघर्ष पर केंद्रित थी, तब रूस को यूक्रेन में अपने सैन्य अभियान तेज करने का अवसर मिल गया।

“ईरान संकट से रूस के पास यूक्रेन में सैन्य कार्यवाही बढ़ाने का सुनहरा अवसर आ गया, क्योंकि अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों का ध्यान अन्य क्षेत्रों में बंटा हुआ है।”

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने चेतावनी दी है कि ईरान में संघर्ष के लंबे समय तक चलने से उनके वायु रक्षा सिस्टम की क्षमता कम हो सकती है, क्योंकि PAC-3 पैट्रियट इंटरसेप्टर सिस्टम की आपूर्ति प्रभावित हो रही है।

रूस-ईरान रक्षा सहयोग में नया आयाम

इस संकट के बीच रूस और ईरान के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। ईरान ने रूस से 500 वर्बा मैन-पोर्टेबल एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम की खरीद की है, जिसकी कुल कीमत लगभग 500 मिलियन यूरो (589 मिलियन डॉलर) है।

  • इस डील के तहत रूस तीन साल में 2,500 “9M336” मिसाइलें भी सप्लाई करेगा
  • डिलीवरी 2027 से 2029 तक तीन चरणों में होगी
  • रूसी डिफेंस कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट इस सौदे का प्रबंधन कर रही है

इसके अलावा, ईरान ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की भी मांग की है, जिसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली वायु रक्षा तंत्रों में से एक माना जाता है।

भारत: तेल खरीद में नई रुचि

भारत ने एक बार फिर रूस से तेल खरीद के संकेत दिए हैं, क्योंकि तेल की बढ़ती कीमतों के बीच रूसी तेल एक सस्ता विकल्प बन गया है। बढ़ती अंतर्राष्ट्रीय कीमतों के बीच भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं को भी इसका असर दिखाई देगा।

यूरोपीय अर्थव्यवस्था पर संकट

जहां रूस को लाभ मिल रहा है, वहीं यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर नुकसान हो रहा है। तेल की बढ़ती कीमतें यूरोपीय देशों की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था को और अधिक दबाव में डाल रही हैं।

  • ऊर्जा की बढ़ती लागत औद्योगिक उत्पादन को प्रभावित कर रही है
  • विनिर्माण क्षेत्र को तेल की कीमतों के बढ़ने से सीधा नुकसान हो रहा है
  • मंहगाई का दबाव यूरोपीय नागरिकों पर पड़ रहा है

वैश्विक राजनीति में रूस की बढ़ती भूमिका

रूस ने इस पूरे संकट में अपनी संतुलनकारी भूमिका को कायम रखने की कोशिश की है। एक ओर तो रूस ने अपने सहयोगी ईरान पर हमलों की कड़ी निंदा की है और डिप्लोमैटिक सहायता का प्रस्ताव रखा है, लेकिन वह सीधी सैन्य मदद नहीं दे रहा।

लेकिन यह स्पष्ट है कि रूस पश्चिम एशिया में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तेहरान में सत्ता में किसी बड़े बदलाव को नहीं चाहते हैं, क्योंकि इससे उनके क्षेत्रीय लक्ष्यों को गंभीर नुकसान हो सकता है।

Key Takeaways

  • आर्थिक लाभ: अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमले से बढ़ी तेल कीमतों से रूस को भारी आर्थिक लाभ मिल रहा है, जो उसके 2026 बजट को सहारा दे रहा है।
  • यूक्रेन में लाभ: विश्व का ध्यान मध्य-पूर्व पर केंद्रित होने से रूस को यूक्रेन में अपने सैन्य अभियान तेज करने का अवसर मिल गया है।
  • रक्षा सहयोग: ईरान के साथ रूस का रक्षा सहयोग गहरा हो रहा है, जिससे दोनों देशों की सामरिक स्थिति मजबूत हो रही है।
  • यूरोपीय संकट: तेल की बढ़ती कीमतें यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक नई चुनौती बन गई हैं।
  • भारत पर असर: अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित करेगी।

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