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खतरनाक खुलासा! भारतीय मीडिया में डीपफेक का धमाका – सच और झूठ में फर्क करना हुआ मुश्किल

खतरनाक खुलासा! भारतीय मीडिया में डीपफेक का धमाका - सच और झूठ में फर्क करना हुआ मुश्किल

📅 प्रकाशित: 22 दिसंबर 2025 | ⏱️ पढ़ने का समय: 8 मिनट | 📰 श्रेणी: मीडिया और तकनीक

🎬 AI vs सच्चाई

क्या आप जानते हैं कि आज के दौर में आप जो देख रहे हैं, वो सच नहीं हो सकता? हाल ही में भारतीय मीडिया में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल करके ऐसे वीडियो बनाए गए जो देखने में बिल्कुल असली लगते हैं, लेकिन हकीकत में पूरी तरह से नकली हैं।

14 दिसंबर को सिडनी के बोंडी बीच पर हुए आतंकी हमले के बाद, सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए जिनमें दावा किया गया कि ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने चार भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया है। लेकिन यह पूरी तरह से झूठ था। इन वीडियो को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से बनाया गया था।

🖼️ [छवि: डीपफेक तकनीक का चित्रण – AI द्वारा बनाए गए नकली वीडियो]

🔍 बोंडी बीच हमला और डीपफेक का खतरनाक खेल

हनुक्का के पवित्र त्योहार के दौरान सिडनी के बोंडी बीच पर हुआ आतंकी हमला बेहद दुखद था जिसमें कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई। लेकिन इस त्रासदी के बाद जो हुआ, वह और भी चिंताजनक था।

हमले के कुछ ही दिनों के भीतर, इंटरनेट पर दो वीडियो तेजी से फैलने लगे। पहले वीडियो में ऑस्ट्रेलियन फेडरल पुलिस की कमिश्नर क्रिसी बैरेट को दिखाया गया था, और दूसरे में प्रसिद्ध पत्रकार पलकी शर्मा उपाध्याय को। दोनों वीडियो में यह दावा किया जा रहा था कि भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है।

⚠️ महत्वपूर्ण तथ्य: द क्विंट और अन्य फैक्ट-चेकिंग संगठनों द्वारा की गई जांच में पता चला कि ये दोनों वीडियो 99 प्रतिशत तक AI-जेनरेटेड थे। यानी ये पूरी तरह से नकली थे।

AI डिटेक्शन टूल्स ने बैरेट के वीडियो की ऑडियो को 99 प्रतिशत AI-जेनरेटेड बताया। वहीं, शर्मा के वीडियो की प्रामाणिकता का स्कोर सिर्फ 100 में से 4 था। असल में, शर्मा का वीडियो 20 नवंबर के एक प्रसारण से लिया गया था जो टैरिफ पर चर्चा के बारे में था, जिसका बोंडी बीच हमले से कोई लेना-देना नहीं था।

🖼️ [छवि: AI डिटेक्शन टूल्स द्वारा डीपफेक की पहचान]

📺 ऑपरेशन सिंदूर और भारतीय मीडिया की विफलता

बोंडी बीच का मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। अप्रैल-मई 2025 में हुए भारत-पाकिस्तान संघर्ष, जिसे ऑपरेशन सिंदूर के नाम से जाना जाता है, के दौरान भारतीय मीडिया चैनलों ने जो कवरेज किया, वह शर्मनाक था।

द फेडरल द्वारा उद्धृत शोध में पाया गया कि कुछ भारतीय न्यूज चैनलों की युद्ध से संबंधित रिपोर्ट्स 99.15 प्रतिशत तक फर्जी थीं। यह आंकड़ा अपने आप में भयावह है और मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाता है।

📊 चौंकाने वाले आंकड़े:

  • 99.15% तक फर्जी रिपोर्टिंग ऑपरेशन सिंदूर के दौरान
  • 99% AI-जेनरेटेड ऑडियो बोंडी बीच डीपफेक में
  • 151वीं रैंक – वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2025 में भारत की स्थिति

आज तक, न्यूज18, और इंडिया टुडे जैसे प्रमुख चैनलों पर ऐसी फर्जी खबरें चलाई गईं जिनमें दावा किया गया कि भारत ने इस्लामाबाद पर कब्जा कर लिया है, कराची के बंदरगाह को तबाह कर दिया है, या पाकिस्तान के आर्मी चीफ को गिरफ्तार कर लिया है। ये सभी दावे पूरी तरह से झूठे थे।

🖼️ [छवि: फर्जी न्यूज हेडलाइन्स का कोलाज]

🎥 पुरानी फुटेज और गलत दावे

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, कई भारतीय मीडिया आउटलेट्स ने इजरायल के आयरन डोम डिफेंस सिस्टम की पुरानी फुटेज दिखाई और इसे जैसलमेर में भारतीय रक्षा अभियान के लाइव विजुअल्स के रूप में प्रस्तुत किया। यह न केवल गलत जानकारी थी बल्कि जनता को जानबूझकर गुमराह करना था।

एक और दुखद मामला था जम्मू-कश्मीर के एक धार्मिक विद्वान और शिक्षक कारी मोहम्मद इकबाल का। सीमा पार गोलाबारी में मारे जाने के बाद, कई प्लेटफार्मों ने उन्हें “पाकिस्तानी आतंकवादी” के रूप में गलत तरीके से पहचाना। यह एक निर्दोष व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी प्रतिष्ठा को बदनाम करने जैसा था।

यह संघर्ष तब शुरू हुआ जब मार्च में पहलगाम में आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हो गई। भारत ने 7 मई को कथित आतंकवादी शिविरों पर हमले किए, जिसके जवाब में पाकिस्तान ने 10 मई को ऑपरेशन बुनयान अल-मरसूस शुरू किया। अगले ही दिन संघर्ष विराम हो गया।

🖼️ [छवि: पुरानी और नई फुटेज की तुलना]

⚖️ सरकारी प्रतिक्रिया और नियामक उपाय

डीपफेक और गलत सूचना के बढ़ते प्रसार ने सरकार को कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया है। अक्टूबर 2025 में, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने IT नियमों में संशोधन प्रस्तावित किए।

इन नए नियमों के तहत, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को अनिवार्य रूप से सिंथेटिक रूप से जेनरेट की गई सामग्री को लेबल करना होगा और सत्यापन उपाय लागू करने होंगे। विनियमों में डीपफेक वीडियो पर प्रमुख “AI-जेनरेटेड” लेबल और हेरफेर किए गए ऑडियो के लिए श्रव्य प्रकटीकरण की आवश्यकता है।

📋 नए IT नियमों की मुख्य बातें:

  • AI-जेनरेटेड कंटेंट पर अनिवार्य लेबलिंग
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए वेरिफिकेशन सिस्टम
  • डीपफेक वीडियो पर स्पष्ट चेतावनी
  • मैनिपुलेटेड ऑडियो के लिए ऑडिबल डिस्क्लोजर

हालांकि, यह कदम काफी देर से उठाए गए हैं। 2025 के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में से 151वें स्थान पर है। अंतरराष्ट्रीय निगरानीकर्ता इसे पत्रकारों के लिए “बहुत गंभीर” माहौल बताते हैं।

🌐 डीपफेक तकनीक: कैसे काम करती है यह खतरनाक साजिश

डीपफेक तकनीक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करके बनाई जाती है। इसमें किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज और शारीरिक हरकतों को नकल करके एक नकली वीडियो या ऑडियो बनाया जाता है जो असली लगता है।

पहले यह तकनीक बहुत महंगी और जटिल थी, लेकिन अब कोई भी व्यक्ति अपने फोन या कंप्यूटर पर मुफ्त या सस्ते ऐप्स का इस्तेमाल करके डीपफेक वीडियो बना सकता है। यही इसे इतना खतरनाक बनाता है।

डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल न केवल फर्जी खबरें फैलाने के लिए किया जा रहा है, बल्कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को बदनाम करने, व्यक्तिगत बदला लेने और यहां तक कि वित्तीय धोखाधड़ी के लिए भी किया जा रहा है।

🖼️ [छवि: डीपफेक तकनीक की प्रक्रिया का इन्फोग्राफिक]

🛡️ खुद को कैसे बचाएं डीपफेक से

डीपफेक के इस युग में, हर व्यक्ति को सतर्क रहना जरूरी है। यहां कुछ महत्वपूर्ण टिप्स दिए गए हैं जो आपको फर्जी कंटेंट से बचने में मदद कर सकते हैं:

✅ सुरक्षा के उपाय:

  • स्रोत की जांच करें: किसी भी वीडियो या खबर को शेयर करने से पहले उसके मूल स्रोत की पुष्टि करें
  • फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट्स का इस्तेमाल करें: Alt News, Boom Live, और The Quint जैसी वेबसाइट्स पर जांच करें
  • वीडियो क्वालिटी देखें: अक्सर डीपफेक वीडियो में होंठों की मूवमेंट ठीक से मैच नहीं होती
  • ऑडियो में असामान्यताएं: आवाज में अप्राकृतिक ब्रेक या रोबोटिक टोन सुनें
  • कई स्रोतों से पुष्टि करें: किसी भी बड़ी खबर के लिए कम से कम 2-3 विश्वसनीय स्रोतों से जांच करें
  • जल्दबाजी में शेयर न करें: सनसनीखेज खबरों को तुरंत शेयर करने से बचें

📱 सोशल मीडिया की जिम्मेदारी

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर (अब X), और इंस्टाग्राम को भी इस मामले में बड़ी जिम्मेदारी लेनी होगी। इन प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी सामग्री सबसे तेजी से फैलती है।

हालांकि कुछ प्लेटफॉर्म्स ने AI-आधारित डिटेक्शन सिस्टम लगाए हैं, लेकिन ये काफी नहीं हैं। डीपफेक बनाने वाली तकनीक उतनी ही तेजी से विकसित हो रही है जितनी कि उसे पकड़ने वाली तकनीक।

व्हाट्सएप पर तो स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि यह एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड है और प्लेटफॉर्म खुद भी संदेशों की सामग्री नहीं देख सकता। यही कारण है कि फर्जी खबरें यहां सबसे तेजी से फैलती हैं।

🖼️ [छवि: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और फेक न्यूज का प्रसार]

🎓 मीडिया साक्षरता की जरूरत

इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है मीडिया साक्षरता। भारत में, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, बहुत से लोग इंटरनेट पर मिलने वाली हर चीज को सच मान लेते हैं। यह एक बड़ी समस्या है।

स्कूलों और कॉलेजों में मीडिया साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। लोगों को यह सिखाना जरूरी है कि वे ऑनलाइन जानकारी को कैसे परखें, कैसे सच और झूठ में फर्क करें, और कैसे जिम्मेदारी से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें।

बुजुर्गों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए क्योंकि वे अक्सर डीपफेक और फर्जी खबरों के सबसे आसान शिकार बनते हैं। परिवार के युवा सदस्यों को भी अपने बड़ों को इन खतरों के बारे में जागरूक करना चाहिए।

⚠️ समाज पर प्रभाव

डीपफेक और फर्जी खबरों का प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं है। यह पूरे समाज को प्रभावित करता है। जब लोगों को यह भरोसा नहीं रहता कि वे जो देख रहे हैं वह सच है, तो सामाजिक विश्वास टूटने लगता है।

राजनीतिक दृष्टि से, डीपफेक का इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने, नफरत फैलाने और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए किया जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फैली फर्जी खबरों ने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को और बढ़ा दिया।

आर्थिक रूप से भी, फर्जी खबरें शेयर बाजार को प्रभावित कर सकती हैं, कंपनियों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती हैं और निवेशकों को गुमराह कर सकती हैं।

🔴 गंभीर परिणाम: फर्जी खबरों के कारण कई मामलों में भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाएं हुई हैं, निर्दोष लोगों की जान गई है, और स

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