भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मार्च में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जिसमें पहली बार निष्क्रिय यूथेनेसिया (जीवन रक्षक उपचार वापस लेने) को मंजूरी दी गई है। यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं है, बल्कि जीवन, मृत्यु और गरिमा से जुड़े गहरे सवालों का एक जवाब है। 32 वर्षीय हरिश राणा की 13 साल की लंबी बीमारी के मामले में दिया गया यह निर्णय पूरे देश में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन गया है।
निष्क्रिय यूथेनेसिया क्या है?
निष्क्रिय यूथेनेसिया का अर्थ है किसी रोगी के जीवन रक्षक चिकित्सा उपचार को वापस लेना या रोकना, ताकि बीमारी या चोट अपना प्राकृतिक रास्ता अपना सके। यह सक्रिय यूथेनेसिया से बिल्कुल अलग है, जहां किसी व्यक्ति को मारने के लिए सक्रिय कदम उठाए जाते हैं।
- निष्क्रिय यूथेनेसिया: जीवन रक्षक उपचार वापस लेना (कानूनी और अनुमति योग्य)
- सक्रिय यूथेनेसिया: किसी को सक्रिय रूप से मारने की कोशिश (भारत में अभी भी अनुमति नहीं)
- मुख्य अंतर: निष्क्रिय यूथेनेसिया में कृत्रिम जीवन जारी नहीं रखा जाता, जबकि सक्रिय यूथेनेसिया में सीधे मौत का कारण बनाया जाता है
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय मौत का चयन नहीं है, बल्कि कृत्रिम तरीके से जीवन को लंबे समय तक चलाए रखने से बचना है जब कोई आशा नहीं रहती।
हरिश राणा का केस – ऐतिहासिक फैसला
हरिश राणा मामला भारतीय कानूनी इतिहास में एक मोड़ साबित हुआ है। अगस्त 2013 में चंडीगढ़ से एक इमारत से गिरने के बाद हरिश 13 साल तक सतत सोए हुए (Persistent Vegetative State) अवस्था में रहे हैं। उनके परिवार ने 2024 में और फिर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में जीवन रक्षक उपचार वापस लेने की अनुमति मांगी थी।
“हमारा यह निर्णय केवल तर्क और विचार में नहीं, बल्कि प्रेम, क्षति, चिकित्सा और करुणा के बीच के स्थान में खड़ा है। यह मौत का चयन नहीं है, बल्कि कृत्रिम रूप से जीवन को लंबे समय तक न रखने का निर्णय है।”
न्यायाधीश जेबी पार्डिवाला और के वी विश्वनाथन की खंडपीठ ने हरिश के मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए 30 दिन की पुनर्विचार अवधि को माफ कर दिया। सभी पक्षों – परिवार, डॉक्टर और चिकित्सा बोर्ड – इस बात पर सहमत थे कि हरिश कभी होश में नहीं आएंगे।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को निर्देश दिया गया है कि हरिश को अपने पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती करे और एक विस्तृत अंत-जीवन देखभाल योजना तैयार करे।
संवैधानिक आधार और कानूनी रूपरेखा
निष्क्रिय यूथेनेसिया का कानूनी आधार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है, जो जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
- अनुच्छेद 21 की व्याख्या: इसमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है
- 2018 का ‘कॉमन कॉज’निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार माना कि “गरिमा के साथ मरने का अधिकार” भी अनुच्छेद 21 में शामिल है
- 2023 का संशोधन: निष्क्रिय यूथेनेसिया की प्रक्रिया को कम जटिल और अधिक व्यावहारिक बनाया गया
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार केवल उन रोगियों के लिए है जो असाध्य बीमारी से ग्रस्त हैं और उनके ठीक होने की कोई आशा नहीं है।
न्यायालय का नैतिक दृष्टिकोण
सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय को केवल कानूनी मुद्दे के रूप में नहीं देखा, बल्कि नैतिकता और मानवीय करुणा के प्रश्न के रूप में देखा। न्यायालय ने विलियम शेक्सपियर के ‘हैमलेट’ से प्रसिद्ध कोट “टु बी ऑर नॉट टु बी” का हवाला दिया।
- करुणा का सिद्धांत: जीवन को कृत्रिम रूप से जारी रखना रोगी के लिए कष्ट का कारण नहीं होना चाहिए
- गरिमा का संरक्षण: रोगी की गरिमा को सर्वोच्च स्तर पर सुरक्षित रखा जाना चाहिए
- बेहतरी का आकलन: निर्णय लेने वालों को रोगी के संपूर्ण कल्याण को ध्यान में रखना चाहिए – केवल चिकित्सीय नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को भी
कब लागू हो सकता है निष्क्रिय यूथेनेसिया?
न्यायालय ने निष्क्रिय यूथेनेसिया के लिए सख्त शर्तें तय की हैं:
- रोगी असाध्य (टर्मिनल) बीमारी से ग्रस्त हो
- लंबे समय तक चिकित्सा उपचार चल रहा हो
- ठीक होने की कोई आशा न हो
- बीमारी का कोई इलाज न हो
- रोगी सहमति देने में सक्षम न हो (चेतन नहीं हो)
यदि रोगी ने “एडवांस डायरेक्टिव” (पहले से लिखित निर्देश) दिया है, तो प्रक्रिया अलग होती है। लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में चिकित्सक, चिकित्सा बोर्ड और परिवार का सर्वसहमति से निर्णय आवश्यक है।
AIIMS के निर्देश और व्यावहारिक कदम
सर्वोच्च न्यायालय ने एम्स को बहुत विस्तृत निर्देश दिए हैं। यूथेनेसिया को एक मानवीय और गरिमापूर्ण तरीके से करने के लिए एक व्यापक पैलिएटिव केयर योजना तैयार करनी होगी।
- पैलिएटिव केयर विभाग में प्रवेश: हरिश को एम्स में स्थानांतरित किया जाएगा
- दर्द प्रबंधन: पूरी प्रक्रिया में किसी भी दर्द, पीड़ा या परेशानी से बचा जाना चाहिए
- गरिमा का संरक्षण: सभी कदम रोगी की गरिमा को बनाए रखते हुए उठाए जाएं
- परिवार का समर्थन: परिवार को पूरी प्रक्रिया में समर्थन और परामर्श दिया जाए
न्यायालय ने केंद्र सरकार को भी आग्रह किया है कि वह अंत-जीवन देखभाल के लिए एक व्यापक कानून बनाए, क्योंकि वर्तमान में भारत में इस विषय पर कोई विस्तृत कानूनी ढांचा नहीं है।
भारतीय चिकित्सा व्यवहार पर प्रभाव
यह निर्णय भारतीय चिकित्सा पेशे के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश प्रदान करता है। डॉक्टरों को अब स्पष्ट कानूनी सुरक्षा मिल गई है जब वे असाध्य रोगियों के लिए जीवन रक्षक उपचार वापस लेने पर विचार करते हैं।
साथ ही, यह निर्णय परिवारों को भी सशक्त करता है। जहां एक व्यक्ति को लंबे समय तक कोमा में रखने से कोई लाभ नहीं है, वहां परिवार वाजिब निर्णय ले सकते हैं।
हालांकि, न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है – यह अधिकार केवल असाध्य बीमारियों तक सीमित है और इसे अनावश्यक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
मुख्य बातें (Key Takeaways)
- ऐतिहासिक निर्णय: यह भारत में पहली बार है जब सर्वोच्च न्यायालय किसी वास्तविक मामले में निष्क्रिय यूथेनेसिया को मंजूरी दी है
- गरिमा का अधिकार: निर्णय गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मजबूत करता है और इसे संवैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित करता है
- कठोर शर्तें: निष्क्रिय यूथेनेसिया केवल असाध्य बीमारियों के लिए है, न कि किसी भी परिस्थिति में
- परिवार की भूमिका: परिवार के सदस्य महत्वपूर्ण निर्णय लेने में भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन चिकित्सा और कानूनी सलाह के साथ
- करुणा और नैतिकता: न्यायालय ने करुणा, प्रेम और मानवीय गरिमा को कानून से ऊपर रखा है
- कानून में खामी: भारत में अभी अंत-जीवन देखभाल के लिए कोई व्यापक कानून नहीं है, और सरकार को एक बनाना चाहिए
- चिकित्सकों के लिए सुरक्षा: यह निर्णय चिकित्सकों को कानूनी सुरक्षा देता है जब वे नैतिक रूप से सही निर्णय लेते हैं
- पैलिएटिव केयर पर जोर: न्यायालय ने पैलिएटिव केयर के महत्व पर जोर दिया है – यह केवल दर्द को कम करने के बारे में नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीने के बारे में है










