राजनीति विज्ञान सम्मलेन 2026: भारत के बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर मंथन
नई दिल्ली के प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 12-13 मार्च 2026 को आयोजित ‘राजनीति विज्ञान सम्मलेन 2026’ ने देश भर के शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों को एक मंच पर ला खड़ा किया। इस दो दिवसीय आयोजन का मुख्य उद्देश्य भारत के समकालीन राजनीतिक विचारों और सार्वजनिक जीवन में हो रहे परिवर्तनशील प्रवृत्तियों पर गहन चर्चा करना था। सम्मलेन में 150 से अधिक शोध पत्रों का प्रस्तुतिकरण हुआ और लगभग 300 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो भारतीय राजनीतिक विमर्श की जीवंतता को दर्शाता है।
सम्मेलन की मुख्य बातें और चर्चाएँ
सम्मेलन का उद्घाटन शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने किया, जिन्होंने भारत के राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र में अकादमिक और नीतिगत संवाद के महत्व पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता के रूप में राम माधव, अध्यक्ष, इंडिया फाउंडेशन, ने अपने संबोधन में भारत की बहुआयामी राजनीतिक व्यवस्था और उसके विकास की दिशा पर अपने विचार रखे। इस अवसर पर वि
प्रमुख सत्र और प्रस्तुतियाँ
दो दिनों के दौरान, सम्मलेन में कई महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किए गए, जिनमें समावेशी शासन, नीति नवाचार, नेतृत्व के विभिन्न आयाम और संस्थागत विकास जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इन सत्रों में इंडिया फाउंडेशन, ऋषहुड विश्वविद्यालय, मिरांडा हाउस, हिंदू कॉलेज, ग्राउंड जीरो कंसल्टिंग और मंथन लर्निंग जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ मिलकर कार्यशालाएं भी आयोजित की गईं।
सम्मेलन के अकादमिक खंड में 12 समानांतर सत्रों में 150 से अधिक शोध पत्रों का प्रस्तुतिकरण हुआ। इन शोधों ने भारतीय राजनीति के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि:
- जाति, धर्म और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बदलते समीकरण
- क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका और राष्ट्रीय राजनीति पर उनका प्रभाव
- डिजिटल युग में राजनीतिक संचार और जनमत निर्माण
- सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की चुनौतियाँ
- अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भारत की उभरती स्थिति
इन विषयों पर गहन शोध प्रस्तुत किए गए, जिन्होंने भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की एक विस्तृत तस्वीर पेश की। लगभग 300 प्रतिभागियों और 50 वक्ताओं ने अकादमिक जगत, सरकार, नागरिक समाज और मीडिया का प्रतिनिधित्व किया, जिससे चर्चाओं में विविधता और गहराई आई।
विशेषज्ञों के विचार और भविष्य की दिशा
“आज के दौर में, जहाँ वैश्विक और घरेलू दबाव लगातार बढ़ रहे हैं, राजनीतिक विज्ञान सम्मेलनों का महत्व और भी बढ़ जाता है। ये मंच हमें जटिल मुद्दों को समझने और प्रभावी समाधान खोजने में मदद करते हैं।”
सम्मेलन के दौरान, वक्ताओं ने भारतीय राजनीतिक विचार के विकास पर भी चर्चा की। आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचार की एक विशिष्ट विशेषता इसका व्यावहारिक और कर्म-उन्मुख दृष्टिकोण है. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और बी.आर. अम्बेडकर जैसे विचारकों ने स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाई. यह परंपरा आज भी जारी है, जहाँ अकादमिक जगत और नीति निर्माण के बीच एक सेतु बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
हाल के वर्षों में, भारतीय राजनीति में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे गए हैं। कांग्रेस प्रणाली के एकाधिकार का अंत, गठबंधन सरकारों का उदय, और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) का राजनीतिक उभार कुछ ऐसे प्रमुख घटनाक्रम हैं जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र को नया आयाम दिया है. इसके अतिरिक्त, 1991 की नई आर्थिक नीति और वैश्वीकरण ने भी देश की राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं को गहराई से प्रभावित किया है.
राजनीतिक जागरूकता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। लोग अब केवल मतदाता नहीं रह गए हैं, बल्कि सक्रिय राजनीतिक खिलाड़ी बन गए हैं, जो अभियान चलाते हैं, विरोध प्रदर्शन करते हैं और नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं. सोशल मीडिया, क्षेत्रीय राजनीतिक आंदोलन और भ्रष्टाचार विरोधी जैसे मुद्दे-आधारित आंदोलन राजनीति को दैनिक जीवन का हिस्सा बना रहे हैं.
भारत की सार्वजनिक नीति और राजनीतिक विमर्श
राजनीति विज्ञान सम्मलेन 2026 में सार्वजनिक नीति के महत्व पर भी विशेष जोर दिया गया। सार्वजनिक नीति विशेषज्ञों की भूमिका भारत के विकास पथ को आकार देने में महत्वपूर्ण है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और शहरी विकास जैसे क्षेत्रों को प्रभावित करती है. हाल के वर्षों में, सार्वजनिक नीति एक पेशा के रूप में स्थापित हुई है, और विभिन्न संस्थान इसके लिए पेशेवरों को तैयार कर रहे हैं.
भारत में सार्वजनिक नीति का निर्माण केवल सरकारी संस्थाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें थिंक टैंक, अनुसंधान संस्थान और गैर-सरकारी संगठन (NGOs) भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं. ये संस्थाएं नीति विश्लेषण, मूल्यांकन और सरकार को सिफारिशें प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। भारत का सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005, नागरिकों को सरकारी निर्णयों के बारे में जानकारी तक पहुँच प्रदान करके जवाबदेही को मजबूत करने का एक प्रमुख उदाहरण है.
यह सम्मलेन भारत के राजनीतिक विमर्श में नैतिकता के समावेश पर भी प्रकाश डालता है। भारतीय राजनीतिक विचार में नैतिक यथार्थवाद और मानवीय स्वभाव की सूक्ष्म समझ का मिश्रण है, जो इसे पश्चिमी परंपराओं से अलग करता है. यह विचार कि ‘साधन भी साध्य जितने ही नैतिक होने चाहिए’ भारतीय राजनीतिक चिंतन का एक अभिन्न अंग है.
मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)
- विविधतापूर्ण राजनीतिक परिदृश्य: सम्मलेन ने भारत के जटिल और विविध राजनीतिक परिदृश्य पर प्रकाश डाला, जिसमें विभिन्न विचारधाराओं, सामाजिक समूहों और क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका पर चर्चा हुई।
- नीति निर्माण में अकादमिक योगदान: शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं के बीच सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया गया, ताकि समकालीन चुनौतियों का प्रभावी समाधान खोजा जा सके।
- बढ़ती राजनीतिक जागरूकता: नागरिकों की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और जनमत को आकार देने में सोशल मीडिया जैसे नए माध्यमों की भूमिका पर चर्चा हुई।
- सार्वजनिक नीति का महत्व: भारत के विकास में सार्वजनिक नीति की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया गया, और इस क्षेत्र में पेशेवर अवसरों पर प्रकाश डाला गया।
- नैतिकता और राजनीति का संगम: भारतीय राजनीतिक विचार में नैतिकता के समावेश और ‘साधन-साध्य’ की नैतिकता पर जोर दिया गया।
- समकालीन चुनौतियाँ: जातिगत राजनीति, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, और आर्थिक असमानता जैसी समकालीन चुनौतियों पर भी विचार-विमर्श हुआ।
- वैश्विक परिप्रेक्ष्य: भारत की विदेश नीति और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इसकी बढ़ती भूमिका पर भी चर्चा की गई।













