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रुपये को बचाने की जंग: आरबीआई की डॉलर बिक्री और भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर

रुपये को बचाने की जंग: आरबीआई की डॉलर बिक्री और भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर

भारतीय रुपया हाल के दिनों में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को इसकी गिरावट को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। व्यापार तनाव, पूंजी बहिर्वाह और उभरते बाजारों में डॉलर की कमी के बढ़ते दबाव के बीच, केंद्रीय बैंक डॉलर बेचकर रुपये को सहारा देने के अपने प्रयासों को तेज कर रहा है। यह सिर्फ एक मुद्रा का मामला नहीं है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता और विदेशी निवेशकों के विश्वास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

आरबीआई की आक्रामक रणनीति और आंकड़े

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने सोमवार को खुलासा किया कि उसने अक्टूबर में विदेशी मुद्रा बाजार में 11.88 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की। यह सितंबर के मुकाबले एक महत्वपूर्ण वृद्धि है, जब आरबीआई ने हाजिर बाजार में 7.91 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की थी। 22 दिसंबर को जारी अपने मासिक बुलेटिन के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने अक्टूबर के महीने में 17.69 अरब डॉलर खरीदे और 29.56 अरब डॉलर बेचे। ये आंकड़े रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर पर फिसलने से रोकने के लिए केंद्रीय बैंक के तेज प्रयासों को दर्शाते हैं।

अक्टूबर के अंत तक, आरबीआई की शुद्ध बकाया फॉरवर्ड बिक्री बढ़कर 63.61 अरब डॉलर हो गई थी, जो सितंबर के अंत में 59.41 अरब डॉलर थी। यह वृद्धि हाजिर और अपतटीय गैर-वितरणीय फॉरवर्ड (NDF) दोनों बाजारों में डॉलर की सक्रिय बिक्री के माध्यम से रुपये के बचाव के प्रति केंद्रीय बैंक की दृढ़ प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। यह रणनीति रुपये को मजबूत करने और अत्यधिक अस्थिरता को कम करने के लिए अपनाई गई है।

रुपये की कमजोरी के मुख्य कारण

रुपया 2025 में एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा के रूप में उभरा है, जिसमें डॉलर के मुकाबले 6% से अधिक की गिरावट आई है। इसकी कमजोरी के कई प्रमुख कारण हैं:

  • अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता में गतिरोध: अमेरिका और भारत के बीच व्यापार वार्ता में जारी गतिरोध ने रुपये के दृष्टिकोण को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। रॉयटर्स के अनुसार, व्यापार समझौते की अनुपस्थिति एक प्रमुख चिंता का विषय है।
  • भारतीय निर्यात पर 50% दंडात्मक टैरिफ: भारतीय निर्यात पर लगाए गए 50% दंडात्मक टैरिफ ने भी रुपये पर दबाव डाला है, जिससे व्यापार संतुलन प्रभावित हुआ है।
  • पूंजी बहिर्वाह: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने इस साल भारतीय इक्विटी से रिकॉर्ड 18 अरब डॉलर निकाले हैं, जो 2022 के पिछले उच्च स्तर 16.5 अरब डॉलर को पार कर गया है। इस तरह का बड़े पैमाने पर पूंजी बहिर्वाह सीधे रुपये को कमजोर करता है।

अक्टूबर में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 88.7650 पर बंद हुआ, सितंबर के अंत में 88.80 के रिकॉर्ड निचले स्तर को छूने के बाद। मुद्रा तब से और नीचे गिर गई थी, पिछले सप्ताह 91.075 के नए सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गई थी, इससे पहले सोमवार को आरबीआई के आक्रामक हस्तक्षेप के बाद 89.65 पर रिकवर हुई थी।

हालिया हस्तक्षेप और उसका सकारात्मक प्रभाव

पिछले सप्ताह, केंद्रीय बैंक ने रुपये की 91 प्रति डॉलर से आगे की गिरावट को रोकने के लिए आक्रामक रूप से हस्तक्षेप किया, डॉलर की बिक्री की। 17 दिसंबर को, राज्य-संचालित बैंकों द्वारा आरबीआई की ओर से डॉलर बेचने के बाद रुपया 1% तक बढ़कर 90.0963 पर पहुंच गया, जो सात महीनों में मुद्रा की सबसे मजबूत इंट्राडे रिकवरी थी। करूर वैश्य बैंक के ट्रेजरी प्रमुख वीआरसी रेड्डी ने रॉयटर्स को बताया, “लगभग 91 पर, रुपया अत्यधिक कमजोर लग रहा है।” आरबीआई विनिमय दर की अस्थिरता को रोकने के लिए हाजिर और फॉरवर्ड बाजारों में हस्तक्षेप करता है।

18 दिसंबर को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग सपाट 90.37 पर खुला। दिन के अंत में यह 90.26 पर बंद हुआ, 12 पैसे की बढ़त के साथ, विदेशी बाजारों में अमेरिकी मुद्रा की व्यापक मजबूती के बावजूद। यह स्थिरता आरबीआई के हस्तक्षेप के बाद आई थी। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 12 दिसंबर को 688.95 अरब डॉलर था, जो पिछले सप्ताह के 687.26 अरब डॉलर से अधिक था। यह केंद्रीय बैंक को आगे भी हस्तक्षेप करने की क्षमता प्रदान करता है।

आगे की राह और आरबीआई गवर्नर का दृष्टिकोण

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 16 दिसंबर को संकेत दिया कि ब्याज दरें लंबी अवधि के लिए कम रहने की संभावना है, भले ही नीति निर्माता संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ विकसित व्यापार वार्ताओं से बाहरी जोखिमों से जूझ रहे हों। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा प्रकाशित एक साक्षात्कार में, मल्होत्रा ने कहा कि केंद्रीय बैंक के अनुमानों से पता चलता है कि दरें “लंबी अवधि के लिए कम रहनी चाहिए।”

यह उल्लेखनीय है कि सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि उभरते बाजारों में केंद्रीय बैंक डॉलर की कमी और मुद्रा अस्थिरता से निपटने के लिए हस्तक्षेप बढ़ा रहे हैं। बांग्लादेश से नाइजीरिया तक, इस सप्ताह की कार्रवाइयां विदेशी मुद्रा बाजारों पर लगातार तनाव और आधिकारिक प्रतिक्रियाओं की सीमाओं को उजागर करती हैं। ईरान की मुद्रा रियाल भी इस सप्ताह रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई, जो वैश्विक स्तर पर ऐसी चुनौतियों का व्यापक संकेत है।

निष्कर्ष

भारतीय रुपये को बचाने की आरबीआई की लड़ाई भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। व्यापार समझौतों में प्रगति, पूंजी बहिर्वाह पर नियंत्रण और वैश्विक आर्थिक स्थिरता रुपये की भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आरबीआई के आक्रामक हस्तक्षेपों ने अल्पकालिक स्थिरता प्रदान की है, लेकिन दीर्घकालिक समाधानों के लिए नीतिगत सामंजस्य और आर्थिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक होगा।

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