Home / Politics / लोकसभा में नक्सलवाद पर गृह मंत्री अमित शाह का संबोधन

लोकसभा में नक्सलवाद पर गृह मंत्री अमित शाह का संबोधन

नक्सलवाद के खिलाफ भारत की निर्णायक लड़ाई: लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह का संबोधन

नई दिल्ली: भारत के आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य में नक्सलवाद, या वामपंथी उग्रवाद (LWE), एक लंबे समय से चली आ रही चुनौती रही है। इस गंभीर मुद्दे पर सरकार के प्रयासों और भविष्य की रणनीति को रेखांकित करने के लिए, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आज लोकसभा में एक महत्वपूर्ण संबोधन दिया। इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त करने के प्रयासों की समीक्षा करना था, जो कि सरकार द्वारा 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह से समाप्त करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।

नक्सलवाद का इतिहास और विकास

नक्सलवाद की जड़ें 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में हुए किसान विद्रोह से जुड़ी हैं। यह आंदोलन सामाजिक-आर्थिक असमानताओं, भूमि अधिकारों के मुद्दों और हाशिए पर पड़े समुदायों के शोषण के खिलाफ एक उग्र प्रतिक्रिया के रूप में उभरा। समय के साथ, यह आंदोलन भारत के कई राज्यों में फैल गया, जिसे ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से जाना जाने लगा। इन वर्षों में, इसने विभिन्न रूप धारण किए और चरमपंथी समूहों, जैसे कि सीपीआई (माओवादी), का गठन हुआ। नक्सलवाद ने न केवल सुरक्षा बलों और आम नागरिकों के लिए खतरा पैदा किया, बल्कि देश के विकास और शासन पर भी गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला।

“नक्सलवाद ने दशकों तक हमारे देश की प्रगति को बाधित किया है, विकास को रोका है और अनगिनत जिंदगियों का नुकसान किया है। लेकिन आज, हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां हम इस चुनौती को निर्णायक रूप से समाप्त करने के कगार पर हैं।” – गृह मंत्री अमित शाह (संभावित उद्धरण)

सरकार के प्रयास और उपलब्धियां

गृह मंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन में वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए सरकार द्वारा किए गए बहुआयामी प्रयासों पर प्रकाश डाला। इन प्रयासों में न केवल सुरक्षा अभियानों को तेज करना शामिल है, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा देना भी एक प्रमुख स्तंभ रहा है।

  • सुरक्षा उपाय: सरकार ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की तैनाती बढ़ाई है, खुफिया जानकारी साझा करने को मजबूत किया है, और राज्य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए सहायता प्रदान की है। इन संयुक्त अभियानों के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में नक्सलियों को मार गिराया गया है, गिरफ्तार किया गया है, और उन्होंने आत्मसमर्पण भी किया है। 2004 से मार्च 2024 तक, 16,000 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2025 में, 300 से अधिक वामपंथी उग्रवादियों को बेअसर किया गया है, जो 2009 के बाद से सबसे तेज दर है।
  • विकास पहल: सुरक्षा के साथ-साथ, सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क संपर्क और अन्य आवश्यक सेवाओं के विस्तार पर भी ध्यान केंद्रित किया है। नक्सलवाद से प्रभावित जिलों की संख्या में भारी कमी आई है। 2014 में जहां 126 जिले सबसे अधिक प्रभावित थे, वहीं अब यह संख्या घटकर केवल तीन रह गई है, जिनमें छत्तीसगढ़ के बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर शामिल हैं। गृह मंत्री ने विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में हुए विकास कार्यों का उल्लेख किया, जहां स्कूलों, राशन की दुकानों और स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना से ‘रेड टेरर’ का साया कम हुआ है।
  • नीति और कार्य योजना: भारत सरकार ने ‘वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना’ को अपनाया है, जो सुरक्षा, विकास और सामुदायिक जुड़ाव के संयोजन पर आधारित है। इस योजना के तहत, केंद्र सरकार राज्यों को वित्तीय और अन्य सहायता प्रदान करती है। 2019-20 से 2023-24 के बीच, विशेष अवसंरचना योजना (SIS), सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) और विशेष केंद्रीय सहायता (SCA) योजनाओं के तहत 4350.78 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।

नक्सलवाद के प्रभाव

नक्सलवाद का प्रभाव केवल हिंसा तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ताने-बाने को भी गहराई से प्रभावित किया है।

  • विकास में बाधा: सड़कों, रेलवे, पुलों और बिजली परियोजनाओं जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को अक्सर नक्सलियों द्वारा निशाना बनाया जाता है, जिससे पिछड़े क्षेत्रों में कनेक्टिविटी और विकास बाधित होता है।
  • विस्थापन: हिंसा के डर से, विशेष रूप से मध्य और पूर्वी भारत के वन और आदिवासी क्षेत्रों में, समुदायों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है।
  • शासन में चुनौतियां: प्रभावित क्षेत्रों में राज्य की उपस्थिति कमजोर हुई है, जिससे स्थानीय प्रशासन और पुलिस के लिए काम करना मुश्किल हो गया है।
  • मनोवैज्ञानिक प्रभाव: निरंतर भय और अनिश्चितता ने लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित किया है, जिससे सामुदायिक बंधन और स्थिरता कमजोर हुई है।

राजनीतिक बहस और भविष्य की दिशा

लोकसभा में हुई चर्चा के दौरान, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस भी देखने को मिली। भाजपा और एनडीए के सदस्यों ने पिछली यूपीए सरकारों पर नक्सलवाद को नियंत्रित करने में विफल रहने का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस ने दावा किया कि उन्होंने वामपंथी उग्रवाद को रोकने के लिए कई प्रयास किए और इस दौरान अपने कई वरिष्ठ नेताओं को खो दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने विशेष रूप से कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद, पार्टी ने आदिवासियों के विकास के लिए कुछ नहीं किया।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक चरण में है। मार्च 2026 की समय सीमा के करीब आते ही, सुरक्षा बलों द्वारा अभियानों को और तेज कर दिया गया है। केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और एकीकृत रणनीति के माध्यम से, भारत वामपंथी उग्रवाद के अंतिम उन्मूलन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

मुख्य बातें (Key Takeaways)

  • केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की लड़ाई पर एक महत्वपूर्ण संबोधन दिया।
  • सरकार का लक्ष्य 31 मार्च, 2026 तक देश को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करना है।
  • नक्सलवाद की उत्पत्ति 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी और यह सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से उपजा है।
  • सरकार ने सुरक्षा अभियानों को तेज करने के साथ-साथ विकास पहलों पर भी जोर दिया है।
  • नक्सली गतिविधियों से प्रभावित जिलों की संख्या में भारी कमी आई है, जो 2014 में 126 से घटकर अब केवल तीन रह गई है।
  • 2004 से मार्च 2024 तक 16,000 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है।
  • 2025 में, लगभग 300 वामपंथी उग्रवादियों को बेअसर किया गया, जो 2009 के बाद सबसे तेज दर है।
  • नक्सलवाद ने देश के विकास, शासन और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला है।
  • लोकसभा में इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस हुई, जिसमें सत्ता पक्ष ने पिछली सरकारों की आलोचना की और विपक्ष ने अपने बलिदानों पर जोर दिया।
  • सरकार का मानना है कि सुरक्षा और विकास के एकीकृत दृष्टिकोण से नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन संभव है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *