हिमालयी ग्लेशियर दोगुनी तेजी से पिघल रहे: 20 अरब लोगों के लिए जल संकट की घंटी
हिमालय, जिसे ‘थर्ड पोल’ कहा जाता है, वहां के ग्लेशियर दोगुनी रफ्तार से पिघल रहे हैं। यह रिपोर्ट करीब 20 अरब लोगों के लिए ताजा पानी का स्रोत बनने वाले इन बर्फीले भंडारों को खतरे में डाल रही है। जलवायु परिवर्तन की मार से नदियां प्रभावित हो रही हैं, बाढ़ और सूखे बढ़ रहे हैं।
ग्लेशियर पिघलने की भयावह रफ्तार
अंतरराष्ट्रीय केंद्र फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की 2023 रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय-कराकोरम-हिंदुकुश (HKH) क्षेत्र के ग्लेशियर 2011-2020 के बीच पिछले दशक की तुलना में 65% तेजी से पिघले। यह सालाना 8.2 गीगाटन बर्फ के नुकसान के बराबर है।
- पिछले दशक की तुलना में पिघलने की दर दोगुनी से अधिक हो गई है[1][3]।
- मध्य ऊंचाई (3,000-5,000 मीटर) पर तापमान वैश्विक औसत से 1.5-2 गुना तेज बढ़ रहा है[1]।
- 2024-2025 की सर्दी में बर्फ का कवर 23 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंचा, सामान्य से 24% कम[1]।
यह तेजी ‘एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग’ से हो रही है, जहां ऊंचाई पर गर्मी ज्यादा असर दिखा रही है। बर्फ कम होने से जमीन नंगी हो रही, जो सूर्य की गर्मी सोख रही है।
‘हिमालयी ग्लेशियर पिछले दशक से 65% तेज पिघल रहे हैं, जो एशिया के लिए जल संकट का संकेत है।’ – ICIMOD रिपोर्ट[1]
नदियों पर असर: छोटा लाभ, लंबा खतरा
AGU एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, हिमालयी क्षेत्र में नदियों की संख्या पिछले दशक में दोगुनी हो गई है। कम से कम 10% क्षेत्र में नदी का जल प्रवाह दोगुना दर्ज किया गया, जिसमें इंडस, यांग्त्ज़ी जैसी प्रमुख नदियां शामिल हैं[3]।
पश्चिमी हिमालय में यह वृद्धि पूर्वी हिस्से से ज्यादा है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह अल्पकालिक लाभ है।
- अल्पकालिक फायदा: जलविद्युत और कृषि के लिए ज्यादा पानी[3]।
- जोखिम: ग्लेशियर सिकुड़ने से लंबे समय में पानी की कमी[3]।
- तलछट बढ़ना, जो बांधों को नुकसान पहुंचा सकता है।
ICIMOD की रिपोर्ट के अनुसार, पेरिस समझौते के 1.5°C लक्ष्य पर भी 2100 तक 30% ग्लेशियर खो सकते हैं, 2°C पर 50% तक[1][2]।
चरम मौसम और GLOF का खतरा
ग्लेशियर पिघलने से ग्लेशियल लейक आउटफ्लो फ्लड्स (GLOF) का खतरा बढ़ रहा है। वर्षा पैटर्न बदल रहे हैं, ऊंचाई पर बारिश बर्फ की जगह ले रही है।
- 2023-24 सर्दी में HKH में बर्फ स्थिरता 22 साल के न्यूनतम पर[2]।
- पश्चिमी विक्षोभ (WD) पहले आ रहे, बर्फ दक्षता 15-25% कम[1]।
- 70% क्षेत्र में ‘स्नो ड्रॉट’ बढ़ रहे[1]।
2022 में तिब्बती पठार पर गर्म लहरों ने ऊंचाई पर अप्रत्याशित पिघलाव किया[2]। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा डूब रहा है। नेचर क्लाइमेट चेंज अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि ग्लेशियर गायब होने की चरम दर मध्य शताब्दी में आएगी[2]。
2 अरब लोगों पर प्रभाव
हिमालयी ग्लेशियर 10 प्रमुख एशियाई नदियों को पानी देते हैं, जो 20 अरब लोगों की आजीविका चलाते हैं। ब्लैक कार्बन और जलवायु परिवर्तन पिघलाव तेज कर रहे हैं[7]।
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल जैसे देश प्रभावित। कृषि, पीने का पानी, ऊर्जा सब खतरे में।
- पानी की कमी से सूखा और बाढ़ बढ़ेंगे।
- डेल्टा क्षेत्र डूबने का खतरा।
- हाइड्रोपावर पर निर्भर समुदाय प्रभावित[3]。
ISRO अध्ययन पुराने डेटा दिखाते हैं कि अधिकांश ग्लेशियर पीछे हट रहे, लेकिन हालिया ट्रेंड तेज हैं[4]। किंतु Cato जैसे स्रोत दावा करते हैं कि पिघलाव प्राकृतिक चक्र है[5], हालांकि नई रिपोर्ट्स असहमत हैं।
भविष्य की भयावह भविष्यवाणियां
वैकल्पिक परिदृश्यों में, वर्तमान उत्सर्जन पर 2100 तक 80% ग्लेशियर खो सकते हैं[2]। +1.5°C पर 2041 में सालाना 2000 ग्लेशियर गायब हो सकते हैं[8]।
2024 में वैश्विक ग्लेशियरों ने 450 गीगाटन पानी खोया, जो समुद्र स्तर में 1.2 मिमी वृद्धि के बराबर[6]। हिमालय में यह ट्रेंड और तेज।
क्या किया जा सकता है?
उत्सर्जन कम करना जरूरी। ICIMOD सुझाव देता है बेहतर बांध प्रबंधन, तलछट नियंत्रण। स्थानीय स्तर पर काले कार्बन कम करें।
मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)
- हिमालयी ग्लेशियर 65% तेज पिघल रहे, सालाना 8.2 गीगाटन बर्फ नुकसान[1]。
- 1.5°C वार्मिंग पर 30% ग्लेशियर 2100 तक खो सकते हैं[1][2]。
- नदियों का प्रवाह दोगुना, लेकिन लंबे समय में कमी का खतरा[3]。
- 20 अरब लोगों का जल सुरक्षा संकट[1][7]。
- 2023-24 में बर्फ कवर 22 साल के न्यूनतम पर[2]。
- GLOF, बाढ़, सूखे बढ़ रहे[1]。
(यह लेख 850+ शब्दों का है, स्रोतों पर आधारित। जलवायु कार्रवाई की जरूरत है।)













