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भारत में भूकंपीय मानचित्र वापसी: विशेषज्ञों की चिंता, तैयारी पर सवाल

भारत की भूकंपीय तैयारी पर संकट: ज़ोनिंग मानचित्र की वापसी ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली: भारत सरकार द्वारा हाल ही में संशोधित भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र और भूकंप डिज़ाइन कोड को वापस लेने के फैसले ने देश भर के विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों को चिंतित कर दिया है। इस कदम को राष्ट्रीय स्तर पर भूकंपीय घटनाओं के प्रति तैयारियों को कमजोर करने वाला माना जा रहा है। पहले, इस अद्यतन मानचित्र ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को उच्चतम जोखिम वाले ज़ोन VI में वर्गीकृत किया था, जो भारत की भूकंपीय संवेदनशीलता को दर्शाता था। अब, इस निर्णय के पीछे के कारणों और इसके संभावित परिणामों पर गहन विचार-विमर्श हो रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र?

भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र किसी देश के विभिन्न क्षेत्रों में भूकंप के संभावित जोखिम का आकलन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये मानचित्र इमारतों और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए सुरक्षित डिज़ाइन कोड और मानकों को निर्धारित करने में मदद करते हैं। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा जारी किए गए इन मानचित्रों के आधार पर, निर्माणकर्ता यह सुनिश्चित करते हैं कि इमारतें भूकंप के झटकों का सामना करने में सक्षम हों।

भारत, अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण, भूकंप के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। भारतीय प्लेट और यूरेशियाई प्लेट के निरंतर टकराव के कारण हिमालयी क्षेत्र विशेष रूप से उच्च जोखिम में है। इस क्षेत्र में बड़े और विनाशकारी भूकंपों का इतिहास रहा है, जैसे कि 1905 का कांगड़ा भूकंप और 1934 का बिहार-नेपाल भूकंप।

पुराना मानचित्र और नई चिंताएँ

पहले के भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्रों ने भारत को चार मुख्य ज़ोन (II, III, IV, और V) में विभाजित किया था, जहाँ ज़ोन V उच्चतम जोखिम वाला क्षेत्र था। हाल ही में, भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने संशोधित भूकंप डिज़ाइन संहिता, 2025 (IS 1893: 2025) के तहत एक नया भूकंपीय ज़ोनेशन मानचित्र जारी किया था, जिसमें पूरे हिमालयी क्षेत्र को नए ‘ज़ोन VI’ में रखा गया था। इस नए मानचित्र के अनुसार, भारत का लगभग 61% भूभाग मध्यम से उच्च भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्र में आता है, जो पहले के 59% से अधिक है। इस अद्यतन का उद्देश्य संभाव्य भूकंपीय खतरा आकलन (PSHA) पर आधारित था, जो अधिक वैज्ञानिक और डेटा-संचालित था।

इस नए मानचित्र ने कई शहरों और क्षेत्रों को उच्च जोखिम वाले ज़ोन में अपग्रेड किया था, जिससे निर्माण लागत में वृद्धि और कड़े सुरक्षा मानकों की आवश्यकता पर बल दिया गया था। विशेष रूप से, हिमालयी क्षेत्र को ‘सुपर-क्रिटिकल’ ज़ोन VI में शामिल करना इस क्षेत्र की अत्यधिक उच्च टेक्टोनिक गतिविधि को दर्शाता है।

वापसी के कारण और विशेषज्ञ की राय

हालांकि, इस नए मानचित्र और कोड की घोषणा के कुछ महीनों के भीतर ही, इसे वापस ले लिया गया है। सूत्रों के अनुसार, इस वापसी के कई कारण हैं:

  • अपर्याप्त हितधारक परामर्श: आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) ने चिंता जताई कि नए कोड को अंतिम रूप देने से पहले हितधारकों के साथ पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया था।
  • वित्तीय प्रभाव: नए मानकों को लागू करने से निर्माण लागत में भारी वृद्धि की आशंका थी। ज़ोन VI और V में लागत में 10%-15% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था, जिससे आवासीय भवनों की लागत 20% से अधिक और अवसंरचना परियोजनाओं की लागत 50% तक बढ़ सकती थी।
  • तकनीकी व्यवहार्यता: कुछ क्षेत्रों में नए अनिवार्य मानकों को लागू करने की तकनीकी व्यवहार्यता पर भी सवाल उठाए गए।
  • सैद्धांतिक आधार: यह तर्क दिया गया कि मौजूदा भूकंप-रोधी निर्माण आवश्यकताओं का अनुपालन पहले से ही कम है, ऐसे में नए ज़ोनिंग को अत्यधिक सैद्धांतिक माना गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस मानचित्र की वापसी देश की भूकंपीय तैयारी में एक बड़ी बाधा है। डॉ. आर.के. शर्मा, एक प्रमुख भूभौतिकीविद्, कहते हैं, “भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं हैं; वे जीवन बचाने और संपत्ति की रक्षा करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण हैं। हिमालय जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में, नवीनतम वैज्ञानिक आकलन के आधार पर कड़े सुरक्षा मानकों का होना अत्यंत आवश्यक है।”

“हमारा मानना है कि वैज्ञानिक डेटा और जमीनी हकीकत के बीच एक संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। हालाँकि, किसी भी तरह की ढिलाई राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकती है,” एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया।

भूकंपीय तैयारी में भारत की स्थिति

भारत का लगभग 59-60% भौगोलिक क्षेत्र भूकंप के प्रति संवेदनशील है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के अनुसार, देश को भूकंपीय खतरे के स्तर के आधार पर विभिन्न ज़ोनों में विभाजित किया गया है। भूकंप-प्रतिरोधी निर्माण को बढ़ावा देने के लिए बिल्डिंग कोड और मानकों को लागू किया गया है, और पुरानी इमारतों के रेट्रोफिटिंग पर भी जोर दिया जा रहा है।

हाल के वर्षों में, भारत ने भूकंपीय निगरानी नेटवर्क का विस्तार किया है और भूकंपीय वेधशालाओं की संख्या में वृद्धि हुई है। 2014 में 80 वेधशालाएँ थीं, जो बढ़कर फरवरी 2025 तक 168 हो गई हैं। इसके अलावा, पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) पर भी शोध चल रहा है, खासकर हिमालयी क्षेत्र के लिए।

क्या हैं आगे के कदम?

इस मानचित्र और कोड की वापसी के बाद, भविष्य के लिए एक स्पष्ट नीति की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि:

  • व्यापक हितधारक परामर्श: किसी भी नए मानक को लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों, जैसे कि बिल्डर्स, इंजीनियर, सरकारी एजेंसियों और आम जनता के साथ गहन विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।
  • आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन: निर्माण लागत पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए और ऐसे समाधान खोजने चाहिए जो सुरक्षा और आर्थिक व्यवहार्यता के बीच संतुलन स्थापित करें।
  • चरणबद्ध कार्यान्वयन: नए मानकों को अचानक लागू करने के बजाय, चरणबद्ध तरीके से लागू करने पर विचार किया जा सकता है, जिससे उद्योग को अनुकूलित होने का समय मिले।
  • वैज्ञानिक सटीकता: नवीनतम वैज्ञानिक डेटा और PSHA जैसी विधियों का उपयोग करके एक सटीक और विश्वसनीय भूकंपीय मानचित्रण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

भारत को भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को लगातार मजबूत करना होगा। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सुरक्षा मानकों से कोई समझौता न हो, खासकर उन क्षेत्रों में जहां भूकंप का खतरा सबसे अधिक है।

मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)

  • भारत सरकार ने हाल ही में जारी किए गए संशोधित भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र और भूकंप डिज़ाइन कोड (IS 1893: 2025) को वापस ले लिया है, जिससे राष्ट्रीय भूकंपीय तैयारी पर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
  • इस नए मानचित्र ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को उच्चतम जोखिम वाले ज़ोन VI में वर्गीकृत किया था और भारत के 61% भूभाग को मध्यम से उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में रखा था।
  • वापसी के मुख्य कारणों में अपर्याप्त हितधारक परामर्श, निर्माण लागत में संभावित भारी वृद्धि, तकनीकी व्यवहार्यता पर सवाल और नए कोड के अत्यधिक सैद्धांतिक होने की चिंताएँ शामिल हैं।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से देश की भूकंपीय तैयारियों को कमजोर किया जा सकता है, खासकर हिमालय जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में।
  • भारत का लगभग 59-60% भूभाग भूकंप के प्रति संवेदनशील है, और NDMA के अनुसार, देश को विभिन्न भूकंपीय ज़ोनों में विभाजित किया गया है।
  • भूकंप-प्रतिरोधी निर्माण को बढ़ावा देने के लिए बिल्डिंग कोड और मानकों का सख्ती से पालन, पुरानी इमारतों का रेट्रोफिटिंग, और पूर्व चेतावनी प्रणालियों का विकास महत्वपूर्ण है।
  • भविष्य में, किसी भी नए मानक को लागू करने से पहले व्यापक हितधारक परामर्श, आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन, और चरणबद्ध कार्यान्वयन पर ध्यान देना आवश्यक होगा।
  • वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों का आग्रह है कि भूकंपीय जोखिमों को कम करने के लिए नवीनतम वैज्ञानिक डेटा और कड़े सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

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