सरकार ने रक्त उत्पाद परीक्षण नियमों में बड़ा बदलाव किया प्रस्तावित
भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 9 मार्च 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए प्लाज्मा-आधारित दवाओं पर दोहरी (डुप्लिकेट) वायरल जांच को समाप्त करने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम वैश्विक मानकों के अनुरूप भारत की दवा उद्योग को आधुनिक बनाएगा और अनावश्यक नियामकीय बोझ कम करेगा। साथ ही, मरीजों की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
मंत्रालय ने औषधि नियमावली 1945 की अनुसूची एफ के भाग XII-सी के पैरा जी में संशोधन के लिए राजपत्र अधिसूचना जीएसआर 164(ई) का मसौदा जारी किया है। इस मसौदे पर सार्वजनिक सुझाव आमंत्रित किए गए हैं और हितधारकों से निर्धारित समय सीमा के भीतर अपने विचार प्रस्तुत करने की अपील की गई है।
क्या हैं प्रस्तावित परिवर्तन?
स्वास्थ्य मंत्रालय के मसौदे में रक्त उत्पादों की जांच प्रक्रिया को वैश्विक फार्माकोपिया मानकों के अनुरूप किया जाएगा। इससे पहले, भारतीय औषधि नियामक ने 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान प्लाज्मा थेरेपी के नैदानिक परीक्षणों को मंजूरी दी थी।
प्रमुख जांचें जो अनिवार्य रहेंगी
- हेपेटाइटिस बी सतह एंटीजन (HBsAg) – यह जांच प्लाज्मा के प्रथम पूल में अनिवार्य होगी
- हेपेटाइटिस सी वायरस RNA (HCV RNA) – संक्रमण की जांच के लिए महत्वपूर्ण परीक्षण
- HIV एंटीबॉडी (Anti-HIV) – यह मानव इम्युनोडिफिशिएंसी वायरस की पहचान के लिए जरूरी है
यदि मानव प्लाज्मा के पहले पूल की जांच में ये सभी परीक्षण नकारात्मक पाए जाते हैं, तभी उसे आगे दवाओं के निर्माण के लिए उपयोग किया जाएगा।
दोहरी जांच की समस्या क्या थी?
मौजूदा नियमों के तहत, पहले से ही जांच किए गए प्लाज्मा से तैयार अंतिम उत्पाद की फिर से उसी वायरस के लिए जांच की जाती है। इस दोहराव वाली जांच को समाप्त करना प्रस्तावित संशोधन का मुख्य उद्देश्य है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस संशोधन से निम्नलिखित लाभ होंगे:
- नियामकीय प्रक्रियाओं में सामंजस्य – भारतीय मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के साथ संरेखित करना
- वैज्ञानिक आधार पर बेहतरी – परीक्षण प्रक्रिया को अधिक तार्किक और विज्ञान-आधारित बनाना
- उद्योग पर कम बोझ – अनावश्यक अनुपालन दायित्वों को घटाना, जिससे दवा निर्माताओं को राहत मिले
- समय और लागत में बचत – प्रक्रिया को तेजी से पूरा किया जा सकेगा
मरीजों की सुरक्षा पर कोई खतरा नहीं
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस संशोधन से मरीजों की सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। दोहरी जांच समाप्त करने के बावजूद, प्लाज्मा उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा के मानकों में कोई कमी नहीं आएगी।
प्लाज्मा रक्त में उपस्थित एक तरल पदार्थ होता है जो शरीर के विभिन्न अंगों की कोशिकाओं तक पोषक तत्व पहुंचाता है। रक्त का लगभग 55% प्लाज्मा होता है, जिसका 90-92% हिस्सा पानी, लवणों (इलेक्ट्रोलाइट्स) और प्रोटीन से बना होता है।
प्लाज्मा थेरेपी का महत्व और इतिहास
कोविड-19 महामारी के दौरान, भारतीय आयुर्विज्ञान शोध परिषद (आईसीएमआर) ने प्लाज्मा थेरेपी के नैदानिक परीक्षणों को मंजूरी दी थी। इस थेरेपी में संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों के रक्त से एंटीबॉडीज निकाले जाते हैं और गंभीर रूप से संक्रमित रोगियों के इलाज में उपयोग किए जाते हैं।
अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने पहले ही कोविड-19 रोगियों के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी को मंजूरी दे चुका है। प्रारंभिक परीक्षणों में, गंभीर रूप से बीमार मरीजों में प्लाज्मा चढ़ाने के बाद उनके नैदानिक लक्षणों में तीन दिनों के अंदर ही सुधार देखा गया था।
सरकार की अन्य पहलें
इसके अलावा, भारत सरकार ने हाल ही में 1.5 लाख बहु-कौशल देखभाल कर्मियों को तैयार करने पर भी चर्चा की है। इसका उद्देश्य देश में बढ़ती देखभाल सेवाओं की जरूरतों को पूरा करना और वैश्विक अवसरों का लाभ उठाना है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में इस तरह की पहलें भारत की दवा उद्योग को मजबूत करती हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाती हैं।
सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया
मंत्रालय ने सभी हितधारकों—दवा निर्माताओं, चिकित्सा विशेषज्ञों, रक्त बैंकों और अन्य संबंधित संस्थानों—से इस मसौदे का अध्ययन कर निर्धारित समय सीमा के भीतर अपने सुझाव प्रस्तुत करने की अपील की है। यह सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि सभी पक्षों के विचार संशोधन में शामिल किए जाएं।
भविष्य की संभावनाएं
यह संशोधन भारत को दवा विनियमन में वैश्विक मानकों के करीब लाता है। प्लाज्मा-आधारित दवाओं की परीक्षण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने से भारतीय दवा कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगी।
इस पहल से आशा है कि भारत की जैव-चिकित्सा क्षेत्र में नवीन उत्पाद तेजी से विकसित और लाए जा सकेंगे, जिससे आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी।
मुख्य बातें (Key Takeaways)
- भारत सरकार ने 9 मार्च 2026 को प्लाज्मा-आधारित दवाओं पर दोहरी वायरल जांच को समाप्त करने का प्रस्ताव दिया है
- यह संशोधन औषधि नियमावली 1945 की अनुसूची एफ के भाग XII-सी में किया जा रहा है
- नए नियमों के तहत, प्लाज्मा में केवल HBsAg, HCV RNA, और Anti-HIV की जांच अनिवार्य होगी
- दोहरी जांच समाप्त करने से उद्योग पर नियामकीय बोझ कम होगा लेकिन मरीजों की सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ेगा
- यह कदम भारत की दवा उद्योग को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है













