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भारत ने महामारी समझौते में लाभ-साझाकरण प्रणाली का समर्थन किया

भारत ने महामारी समझौते में लाभ-साझाकरण प्रणाली के लिए आवाज़ उठाई

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा प्रस्तावित महामारी समझौते के संबंध में चल रही बातचीत में, भारत ने विकासशील देशों के एक समूह के साथ मिलकर एक महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। यह समूह इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि जो देश रोगजनक सामग्री (pathogen materials) और आनुवंशिक अनुक्रम डेटा (genetic sequence data) साझा करते हैं, उन्हें बदले में उचित, ठोस और कानूनी रूप से लागू करने योग्य लाभ प्राप्त होने चाहिए। यह कदम COVID-19 महामारी के दौरान वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा और समानता से जुड़े मुद्दों पर प्रकाश डालता है, जहाँ कई विकासशील देशों ने महत्वपूर्ण संसाधन साझा किए लेकिन लाभों का उचित बँटवारा नहीं हुआ।

महामारी समझौते का उद्देश्य भविष्य में वैश्विक स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए दुनिया की तैयारी और प्रतिक्रिया को मजबूत करना है। इस समझौते पर तीन वर्षों से अधिक की गहन बातचीत के बाद 20 मई 2025 को विश्व स्वास्थ्य सभा में सहमति बनी। यह समझौता अंतरराष्ट्रीय सहयोग, समानता और लचीलेपन को बढ़ावा देने के लिए एक ढाँचा प्रदान करता है। हालांकि, समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू रोगजनक पहुंच और लाभ-साझाकरण (Pathogen Access and Benefit-Sharing – PABS) प्रणाली है, जिसके विवरण पर अभी भी गहन विचार-विमर्श चल रहा है।

लाभ-साझाकरण प्रणाली का महत्व

भारत और विकासशील देशों के समूह ‘ग्रुप फॉर इक्विटी’ का यह मानना है कि रोगजनकों (जैसे वायरस और बैक्टीरिया) के नमूने और उनके आनुवंशिक डेटा को साझा करने से न केवल वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा मिलता है, बल्कि यह अनुसंधान और विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है। COVID-19 महामारी ने इस बात को स्पष्ट कर दिया कि रोगजनकों के तीव्र और व्यापक आदान-प्रदान से प्रभावी निगरानी, समय पर निदान, अनुसंधान और विकास, और संक्रामक रोगों के नियंत्रण में मदद मिलती है। हालांकि, इस साझाकरण के बदले में विकासशील देशों को उचित लाभ मिलना सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है, ताकि वे भी भविष्य की महामारियों का सामना करने के लिए सशक्त हो सकें।

लाभ-साझाकरण के तहत, जो देश रोगजनक सामग्री साझा करते हैं, उन्हें विभिन्न प्रकार के लाभ मिल सकते हैं। इसमें शामिल हैं:

  • मौद्रिक लाभ: उन उत्पादों के व्यावसायीकरण से प्राप्त राजस्व का एक प्रतिशत लाभ-साझाकरण प्रणाली में वापस भुगतान किया जा सकता है।
  • गैर-मौद्रिक लाभ: इसमें उत्पादकों द्वारा आपात स्थिति के दौरान महामारी-रोधी उत्पादों के वास्तविक समय उत्पादन का एक प्रतिशत आरक्षित करना (कम से कम 10% दान के रूप में), विकासशील देशों के निर्माताओं को गैर-अनन्य लाइसेंस प्रदान करना, और उत्पादों को सस्ती या गैर-लाभकारी कीमतों पर उपलब्ध कराना शामिल हो सकता है।

यह दृष्टिकोण ‘नागोया प्रोटोकॉल’ के सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों को उचित और समान रूप से साझा करना है। हालांकि, महामारी के संदर्भ में रोगजनकों के साझाकरण के लिए एक विशेष और अधिक प्रभावी तंत्र की आवश्यकता महसूस की जा रही है, क्योंकि नागोया प्रोटोकॉल कभी-कभी रोगजनक नमूनों तक पहुंच को अवरुद्ध कर सकता है।

भारत की भूमिका और वैश्विक स्वास्थ्य समानता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्वास्थ्य में समावेशिता और विशेष रूप से ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) के प्रति देखभाल पर जोर दिया है, जो स्वास्थ्य चुनौतियों से असमान रूप से प्रभावित होते हैं। भारत, जेनेरिक दवाओं और टीकों के दुनिया के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक होने के नाते, यह सुनिश्चित करने में एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों (LMICs) को दवाओं और टीकों तक अधिक समान पहुंच मिले। भारत की ‘आयुष्मान भारत’ जैसी पहलों ने स्वास्थ्य व्यय को कम किया है और सार्वजनिक फार्मेसियों के माध्यम से दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई है।

महामारी समझौते का उद्देश्य भविष्य की महामारियों के लिए वैश्विक समन्वय को मजबूत करना है, जिसमें टीकों, उपचारों और निदान तक समान और समय पर पहुंच सुनिश्चित की जा सके। यह समझौता राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करते हुए वैश्विक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए साझा जिम्मेदारी पर भी जोर देता है। भारत ने 20 मई 2025 को विश्व स्वास्थ्य सभा में इस समझौते को अपनाया है, जो वैश्विक स्वास्थ्य तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

“महामारी की तैयारी और प्रतिक्रिया में निवेश लागत प्रभावी है, फिर भी वैश्विक और घरेलू स्तर पर इस पर लगातार कम ध्यान दिया गया है। उभरते स्वास्थ्य खतरों ने आतंकवाद से कहीं अधिक जानें ली हैं, लेकिन उन्हें आतंकवाद विरोधी प्रयासों की तुलना में वैश्विक या अमेरिकी धन का एक अंश भी नहीं मिलता है।”

– शोधों से प्राप्त निष्कर्ष

चुनौतियाँ और आगे की राह

महामारी समझौते के वार्ताकारों के सामने कई चुनौतियाँ हैं, विशेष रूप से PABS प्रणाली के संचालन विवरण को लेकर। विभिन्न देशों के हित और प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं, जिससे आम सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है। COVID-19 महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों की कमजोरियों और निदान, उपचारों और टीकों तक पहुंच में भारी असमानताओं को उजागर किया।

यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि भविष्य की महामारियों के लिए एक मजबूत और न्यायसंगत प्रतिक्रिया तंत्र विकसित किया जाए। इसमें न केवल रोगजनक सामग्री का त्वरित और पारदर्शी साझाकरण शामिल है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि इस साझाकरण से उत्पन्न होने वाले लाभों का उचित और समान रूप से वितरण हो। भारत का रुख, विकासशील देशों के साथ मिलकर, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो वैश्विक स्वास्थ्य समानता और न्याय के सिद्धांतों को मजबूत करता है।

आगे की राह में, सदस्य देशों को PABS प्रणाली के लिए एक व्यावहारिक और प्रभावी ढाँचा विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इसमें विभिन्न हितधारकों, जैसे कि वैज्ञानिक समुदाय, फार्मास्युटिकल उद्योग और राष्ट्रीय सरकारों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की भूमिका इन वार्ताओं को सुविधाजनक बनाने और यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होगी कि समझौता सभी के लिए, विशेष रूप से सबसे कमजोर लोगों के लिए, एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य का मार्ग प्रशस्त करे।

मुख्य बातें (Key Takeaways)

  • भारत ने WHO के महामारी समझौते में रोगजनक सामग्री और आनुवंशिक डेटा साझा करने वाले विकासशील देशों के लिए उचित और कानूनी रूप से लागू करने योग्य लाभ-साझाकरण प्रणाली की वकालत की है।
  • महामारी समझौता भविष्य की स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए वैश्विक तैयारी और प्रतिक्रिया को मजबूत करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसे 20 मई 2025 को विश्व स्वास्थ्य सभा में अपनाया गया था।
  • PABS (Pathogen Access and Benefit-Sharing) प्रणाली समझौते का एक महत्वपूर्ण लेकिन विवादास्पद हिस्सा है, जिसके विवरण पर अभी भी बातचीत चल रही है।
  • लाभ-साझाकरण के तहत मौद्रिक और गैर-मौद्रिक दोनों तरह के लाभ शामिल हो सकते हैं, जैसे राजस्व का हिस्सा या रियायती मूल्य पर उत्पादों की उपलब्धता।
  • भारत, ‘ग्लोबल साउथ’ के स्वास्थ्य समानता पर जोर देते हुए, दवाओं और टीकों तक समान पहुंच सुनिश्चित करने में अपनी विनिर्माण क्षमता का लाभ उठाने की भूमिका निभा सकता है।
  • COVID-19 महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में मौजूद असमानताओं को उजागर किया है, जिससे एक न्यायसंगत लाभ-साझाकरण तंत्र की आवश्यकता और बढ़ गई है।
  • समझौते की सफलता सदस्य देशों के बीच निरंतर प्रतिबद्धता, सहयोग और निवेश पर निर्भर करेगी, जिसमें PABS प्रणाली के लिए एक प्रभावी ढाँचा विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।

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