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बीजेडी विधायकों के क्रॉस-वोटिंग पर सवाल: क्या शो-कॉज नोटिस कानूनी है?

बीजेडी विधायकों के क्रॉस-वोटिंग पर हंगामा: शो-कॉज नोटिस की वैधता पर उठे सवाल

राज्यसभा चुनाव में बीजू जनता दल (बीजेडी) के छह विधायकों द्वारा कथित तौर पर पार्टी लाइन से हटकर मतदान करने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। इन विधायकों को पार्टी की ओर से ‘कारण बताओ’ (शो-कॉज) नोटिस जारी किया गया है, जिस पर अब ये विधायक सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि राज्यसभा चुनावों में पार्टी व्हिप या किसी भी प्रकार का निर्देश जारी करना असंवैधानिक और मनमाना है। यह घटनाक्रम न केवल ओडिशा की राजनीति में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी दल-बदल विरोधी कानूनों और विधायकों के अधिकारों के बीच की बारीक रेखा पर बहस छेड़ता है।

राज्यसभा चुनाव: प्रक्रिया और क्रॉस-वोटिंग का संदर्भ

राज्यसभा, जिसे ‘ the Council of States’ भी कहा जाता है, भारत के ऊपरी सदन के रूप में कार्य करती है। इसके सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा एक एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के माध्यम से किया जाता है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 80 में वर्णित है. यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि ऊपरी सदन में राज्यों का प्रतिनिधित्व हो। हालांकि, यह अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली क्रॉस-वोटिंग की संभावनाओं को भी जन्म देती है, जहां विधायक अपनी पार्टी के उम्मीदवार के बजाय किसी अन्य उम्मीदवार को वोट देते हैं।

ऐतिहासिक रूप से, राज्यसभा चुनाव अक्सर निर्विरोध संपन्न होते थे, लेकिन 1998 में महाराष्ट्र में क्रॉस-वोटिंग की घटनाओं ने इस प्रवृत्ति को बदल दिया. इस समस्या से निपटने के लिए, 2003 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन किया गया, जिसने राज्यसभा चुनावों के लिए ‘खुली बैलट प्रणाली’ (open ballot system) लागू की. इस प्रणाली के तहत, विधायकों को मतदान के बाद अपने मतपत्र को पार्टी एजेंट को दिखाना होता है, जिससे क्रॉस-वोटिंग की निगरानी की जा सके। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि राज्यसभा चुनावों में दल-बदल विरोधी कानून (Tenth Schedule) सीधे तौर पर लागू नहीं होता है, और पार्टियाँ अपने सदस्यों को वोट देने के लिए ‘व्हिप’ जारी नहीं कर सकतीं.

बीजेडी विधायकों की दलीलें: ‘कारण बताओ’ नोटिस की वैधता पर प्रश्न

हाल ही में ओडिशा में हुए राज्यसभा चुनावों में, बीजेडी के छह विधायकों – चक्रமணி कान्हर, नबा किशोर मलिक, सौविक बिश्वान, सुभाषिनी जेना, रमाकांत भोई और देवी रंजन त्रिपाठी – पर पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप रॉय के पक्ष में मतदान करने का आरोप है. इन विधायकों को बीजेडी की मुख्य सचेतक प्रमिला मल्लिक द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है, जिसमें उनसे 20 मार्च तक जवाब मांगा गया है.

इन विधायकों ने नोटिस को ‘अवैध, मनमाना, निराधार और असंवैधानिक’ बताते हुए इसे चुनौती दी है। विधायक देवी रंजन त्रिपाठी ने अपने जवाब में कहा है कि राज्यसभा चुनावों में किसी भी सदस्य को वोट डालने या न डालने के लिए निर्देशित या व्हिप जारी करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत प्राप्त संघ बनाने की स्वतंत्रता का उल्लंघन है. उनका तर्क है कि ऐसी कोई भी कार्रवाई, जो विधायकों को अपनी मर्जी से वोट देने से रोकती है, वह अनुचित है। इसके अलावा, उन्होंने नोटिस में इस्तेमाल की गई भाषा पर भी आपत्ति जताई है, जिसे वे भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 171 के तहत दंडनीय अपराध मानते हैं, जो चुनाव को अनुचित रूप से प्रभावित करने से संबंधित है.

कानूनी और संवैधानिक दृष्टिकोण

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(c) सभी नागरिकों को संघ या यूनियन बनाने का अधिकार देता है. इसमें राजनीतिक दलों का गठन और उनमें भागीदारी शामिल है। हालांकि, यह अधिकार असीमित नहीं है और अनुच्छेद 19(4) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित में उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, चुनावों के संचालन, उम्मीदवारों की योग्यता और अयोग्यता, और चुनावी अपराधों से संबंधित है. राज्यसभा चुनावों के संदर्भ में, 2003 के संशोधन ने खुली बैलट प्रणाली पेश की, जिसका उद्देश्य क्रॉस-वोटिंग को रोकना था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006) मामले में स्पष्ट किया था कि राज्यसभा चुनावों में पार्टी निर्देशों के विरुद्ध मतदान करने पर दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता लागू नहीं होती है. इसका मतलब है कि पार्टियाँ अपने सदस्यों को वोट देने के लिए ‘व्हिप’ जारी नहीं कर सकतीं, और यदि कोई विधायक पार्टी लाइन के विरुद्ध वोट करता है, तो उसे दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता है.

बीजेडी विधायकों का यह तर्क कि राज्यसभा चुनावों में व्हिप जारी करना अवैध है, इस कानूनी व्याख्या के अनुरूप प्रतीत होता है। इसलिए, पार्टी द्वारा जारी ‘कारण बताओ’ नोटिस की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि पार्टी इन विधायकों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो यह मामला कानूनी और संवैधानिक व्याख्या के लिए अदालतों तक पहुँच सकता है।

आगे की राह: अनुशासन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन

यह घटनाक्रम राजनीतिक दलों के लिए एक चुनौती पेश करता है कि वे अपने विधायकों के बीच अनुशासन कैसे बनाए रखें, खासकर जब राज्यसभा जैसे अप्रत्यक्ष चुनावों में व्यक्तिगत वोटिंग की स्वतंत्रता की बात आती है। जहाँ एक ओर, पार्टियों को अपने वोटों को सुरक्षित करने और चुनावी रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए अपने सदस्यों से वफादारी की उम्मीद होती है, वहीं दूसरी ओर, विधायकों को यह भी अधिकार है कि वे अपने विवेक के अनुसार मतदान करें, जब तक कि कानून द्वारा विशेष रूप से प्रतिबंधित न हो।

बीजेडी के लिए, इन विधायकों के खिलाफ कार्रवाई का निर्णय पार्टी के आंतरिक नियमों, राजनीतिक दांव-पेच और कानूनी सलाह पर निर्भर करेगा। यदि नोटिस को अवैध माना जाता है, तो पार्टी को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। यह मामला भविष्य में राज्यसभा चुनावों में पार्टी व्हिप की भूमिका और विधायकों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है।

मुख्य बातें

  • बीजू जनता दल (बीजेडी) ने राज्यसभा चुनावों में क्रॉस-वोटिंग के आरोप में छह विधायकों को ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी किया है।
  • विधायक इस नोटिस को अवैध और मनमाना बता रहे हैं, उनका तर्क है कि राज्यसभा चुनावों में पार्टी व्हिप जारी करना असंवैधानिक है।
  • राज्यसभा सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
  • 2003 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन के बाद राज्यसभा चुनावों में ‘खुली बैलट प्रणाली’ लागू की गई है।
  • दल-बदल विरोधी कानून (Tenth Schedule) सीधे तौर पर राज्यसभा चुनावों पर लागू नहीं होता है, और पार्टियाँ व्हिप जारी नहीं कर सकतीं।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, राज्यसभा चुनावों में पार्टी निर्देशों के विरुद्ध मतदान करने पर दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता लागू नहीं होती है।
  • बीजेडी विधायकों का तर्क है कि अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत उन्हें संघ बनाने की स्वतंत्रता है, जो व्हिप जारी करने की अनुमति नहीं देता।
  • यह मामला राजनीतिक दलों के लिए अनुशासन और विधायकों की व्यक्तिगत मतदान स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को उजागर करता है।

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