केरल विधानसभा चुनाव 2026: महंगाई बनी चुनावी चर्चा का प्रमुख मुद्दा
जैसे-जैसे केरल विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, महंगाई और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें जनता के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गई हैं। राज्य की एक सुस्थापित कल्याणकारी व्यवस्था ने हमेशा से महंगाई के प्रभाव को, विशेषकर कमजोर वर्गों पर, कम करने का प्रयास किया है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने राज्य सरकार द्वारा बाजार हस्तक्षेप के उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए हैं। चुनाव प्रचार के दौरान, चाय की दुकानों और राशन की दुकानों पर नारों से ज़्यादा कीमतों पर चर्चा हो रही है, जो यह दर्शाता है कि महंगाई राज्य में मतदाता भावना को आकार देने वाली एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी है।
केरल का कल्याणकारी मॉडल और महंगाई का प्रभाव
केरल ने दशकों से एक मजबूत कल्याणकारी वास्तुकला का निर्माण किया है, जिसका उद्देश्य अपने नागरिकों, विशेष रूप से वंचितों, को आवश्यक वस्तुओं की स्थिर आपूर्ति और उचित मूल्य सुनिश्चित करना है। इस मॉडल में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का सुदृढ़ीकरण, सब्सिडी वाले आवश्यक सामानों का वितरण, और बाजार हस्तक्षेप के माध्यम से कीमतों को नियंत्रित करना शामिल है। हाल के वर्षों में, केरल सरकार ने ‘K-Stores’ की शुरुआत, ‘Oppam’ योजना के तहत जरूरतमंदों तक राशन पहुंचाना, और मोबाइल राशन की दुकानों जैसी पहलों के माध्यम से इस वास्तुकला को और मजबूत किया है [2, 11]। इन पहलों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी नागरिक, विशेषकर संकट के समय में, भोजन से वंचित न रहे।
खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि: एक गंभीर चिंता
हाल के आंकड़े बताते हैं कि केरल में खाद्य मुद्रास्फीति राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही है। जनवरी 2025 में, केरल में खाद्य मुद्रास्फीति 9.9% थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 5.68% था [4]। तेल और वसा, और फलों की कीमतों में वृद्धि को इस वृद्धि का मुख्य कारण बताया गया है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य की 80% से अधिक खाद्य आवश्यकताओं का आयात पर निर्भर होना, ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों के कारण स्थानीय महंगाई को बढ़ाता है [8]।
खाद्य मुद्रास्फीति के प्रमुख कारण:
- तेल और वसा की कीमतों में 52% की वृद्धि (जनवरी 2025 में) [4]।
- फलों की कीमतों में वृद्धि [4]।
- नारियल तेल की कीमतों में 108.70% की वृद्धि [7]।
- आयात पर निर्भरता और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान [8]।
सरकारी हस्तक्षेप: प्रभावशीलता पर बहस
केरल सरकार ने महंगाई से निपटने के लिए विभिन्न बाजार हस्तक्षेप उपाय किए हैं। ‘Supplyco’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से, सरकार आवश्यक वस्तुओं को रियायती दरों पर उपलब्ध कराती है। पिछले पांच वर्षों में, 13 आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में मई 2016 से फरवरी 2024 तक कोई वृद्धि नहीं हुई है, और ये वर्तमान में बाजार दरों से 20-30% कम पर उपलब्ध हैं [2]। इसके अतिरिक्त, सरकार विशेष अवसरों जैसे कि ओणम, रमज़ान, विशु और क्रिसमस के दौरान विशेष मेले आयोजित करती है ताकि कृत्रिम मूल्य वृद्धि को रोका जा सके [2]।
“राज्य सरकार ने ‘Supplyco’ के माध्यम से आवश्यक वस्तुओं को उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने के लिए बाजार हस्तक्षेप में महत्वपूर्ण निवेश किया है। पिछले दशक में, ‘Supplyco’ को बाजार हस्तक्षेप के लिए ₹7,630 करोड़ से अधिक प्रदान किए गए हैं, जिसमें से अधिकांश राशि एलडीएफ सरकारों द्वारा आवंटित की गई है।” – वित्त मंत्री के एन बालागोपाल [14]
हालांकि, कुछ विशेषज्ञ इन उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हैं। उनका तर्क है कि केरल की लगभग 80% खाद्य आवश्यकताएं आयात की जाती हैं, जिससे राज्य संरचनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है [8]। कुछ अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि 2012-2017 के बीच केरल में खाद्य मुद्रास्फीति राष्ट्रीय औसत से अधिक थी [21]।
केरल के खाद्य सुरक्षा मॉडल की अनूठी विशेषताएं
केरल का खाद्य सुरक्षा मॉडल अपनी समावेशिता और नवाचार के लिए जाना जाता है। इसमें शामिल हैं:
- K-Stores: सार्वजनिक वितरण प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए 2181 K-Stores चालू हैं, जो बैंकिंग सेवाओं और अन्य सुविधाओं की भी पेशकश करते हैं [2]।
- ‘Oppam’ योजना: बिस्तर पर पड़े या चलने-फिरने में असमर्थ लोगों के लिए घर पर राशन पहुंचाने की व्यवस्था [2]।
- मोबाइल राशन की दुकानें: दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों तक पहुंचने के लिए [2]।
- ‘Subhiksha’ होटल: ₹30 में सब्सिडी वाला भोजन प्रदान करने वाले 47 होटल [2]।
- डोरस्टेप डिलीवरी: विशेष रूप से जरूरतमंदों के लिए [11]।
ये पहलें यह सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं कि राज्य की कल्याणकारी वास्तुकला महंगाई के दौर में भी प्रभावी बनी रहे। केरल ने 1965 से एक सार्वभौमिक राशनिंग प्रणाली बनाए रखी है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुसार अपनी प्रणाली को अनुकूलित किया है [2]।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य की चुनौतियाँ
हालांकि सरकार अपनी कल्याणकारी पहलों और बाजार हस्तक्षेपों पर जोर देती है, कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि राज्य की आयात पर भारी निर्भरता इसे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है [8]। ‘Gulati Institute of Finance and Taxation’ (GIFT) के शोधकर्ताओं ने बताया है कि जबकि केरल ने महामारी के दौरान कीमतों को नियंत्रित करने में अच्छा प्रदर्शन किया, राज्य की संरचनात्मक भेद्यताएं एक चुनौती बनी हुई हैं [13]।
चुनावों से पहले, मतदाता इन कल्याणकारी योजनाओं की प्रभावशीलता और सरकार की बाजार हस्तक्षेप नीतियों की स्थिरता का मूल्यांकन करेंगे। यह देखना बाकी है कि क्या ये उपाय जनता की चिंताओं को दूर करने और आगामी चुनावों में एलडीएफ सरकार की स्थिति को मजबूत करने के लिए पर्याप्त होंगे।
मुख्य बातें
- केरल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले महंगाई, विशेष रूप से खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि, एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गई है।
- राज्य की सुस्थापित कल्याणकारी वास्तुकला ने हमेशा से महंगाई के प्रभाव को कम करने का प्रयास किया है।
- केरल में खाद्य मुद्रास्फीति राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही है, जिसका मुख्य कारण तेल, वसा और फलों की कीमतों में वृद्धि है।
- सरकार ने ‘Supplyco’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से बाजार हस्तक्षेप, सब्सिडी और विशेष मेलों के माध्यम से कीमतों को नियंत्रित करने के उपाय किए हैं।
- ‘K-Stores’, ‘Oppam’ योजना और मोबाइल राशन की दुकानों जैसी पहलें राज्य के खाद्य सुरक्षा मॉडल का हिस्सा हैं।
- कुछ विशेषज्ञों ने राज्य की आयात पर निर्भरता और सरकारी उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए हैं।
- चुनावों के दौरान, मतदाता इन कल्याणकारी योजनाओं और महंगाई से निपटने की सरकार की क्षमता का मूल्यांकन करेंगे।













