Home / Weather and Climate / भारत में अल नीनो का खतरा: सामान्य से कम मानसून की आशंका

भारत में अल नीनो का खतरा: सामान्य से कम मानसून की आशंका

अल नीनो का बढ़ता खतरा: भारत में सामान्य से कम मानसून की आहट

भारत के लिए चिंता की खबर है, क्योंकि मौसम विभाग (IMD) ने साल 2026 के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने की भविष्यवाणी की है। अल नीनो के बढ़ते प्रभाव के कारण, इस बार देश में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है, जो सीधे तौर पर भारतीय कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। यह पूर्वानुमान किसानों के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी अपनी आजीविका के लिए मानसून पर निर्भर है।

अल नीनो और मानसून का संबंध

अल नीनो, प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि की एक जलवायु घटना है। यह वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है, और भारत के संदर्भ में, यह अक्सर मानसून की वर्षा को कम करने से जुड़ी होती है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, इस बार अल नीनो के विकसित होने की प्रबल संभावना है, जो मानसून के दूसरे भाग, विशेषकर अगस्त और सितंबर के महीनों में, वर्षा को प्रभावित कर सकता है।

IMD का पूर्वानुमान: आंकड़े और संभावनाएं

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी पहले दीर्घकालिक पूर्वानुमान के अनुसार, 2026 में देश भर में मानसून की वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है।

  • कुल वर्षा: पूरे देश में मानसून की वर्षा, दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 92% रहने का अनुमान है। LPA, 1971-2020 के बीच की अवधि का औसत है, जो लगभग 87 सेमी है।
  • ‘सामान्य से कम’ वर्षा: LPA के 90-95% के बीच वर्षा को ‘सामान्य से कम’ माना जाता है।
  • ‘कम वर्षा’ की संभावना: 90% LPA से कम वर्षा, जिसे ‘कम वर्षा’ कहा जाता है, की संभावना सबसे अधिक 35% है।
  • ‘सामान्य से कम’ वर्षा की संभावना: 31% संभावना है कि मानसून ‘सामान्य से कम’ (90-95% LPA) रहेगा।
  • ‘सामान्य’ वर्षा की संभावना: 27% संभावना है कि वर्षा सामान्य (96-104% LPA) रहेगी।

यह पहली बार है कि IMD ने अप्रैल में इस तरह का पूर्वानुमान जारी किया है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने मानसून में अधिशेष वर्षा का अनुभव किया था, लेकिन इस बार का परिदृश्य अलग हो सकता है।

कृषि क्षेत्र पर संभावित प्रभाव

भारत की लगभग 60% आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, और खरीफ फसलों के मौसम के लिए वे पूरी तरह से मानसून की वर्षा पर निर्भर करते हैं। सामान्य से कम या कम वर्षा का मतलब है:

  • फसल उत्पादन में कमी: सिंचाई के लिए पानी की कमी से खरीफ (गर्मी में बोई जाने वाली) और रबी (सर्दियों में बोई जाने वाली) दोनों फसलों के रकबे और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • सिंचाई और जल संकट: कुओं, जलाशयों और अन्य जल स्रोतों में पानी का स्तर गिर सकता है, जिससे सिंचाई और पीने के पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, खासकर शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में।
  • खाद्य मुद्रास्फीति: फसल उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिससे आम आदमी पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव: किसानों की आय में कमी से ग्रामीण उपभोग और समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

इसके अतिरिक्त, डीजल और उर्वरकों जैसे कृषि इनपुट की बढ़ती लागत, और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण ऊर्जा की उच्च लागत, किसानों के लिए स्थिति को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकती है।

अन्य कारक जो मानसून को प्रभावित कर सकते हैं

हालांकि अल नीनो एक प्रमुख चिंता का विषय है, कुछ अन्य जलवायु कारक भी मानसून को प्रभावित कर सकते हैं:

  • भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD): यदि मानसून के दूसरे भाग में सकारात्मक IOD की स्थिति विकसित होती है, तो यह अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकती है। सकारात्मक IOD आमतौर पर भारतीय क्षेत्र में अधिक वर्षा लाता है।
  • उत्तरी गोलार्ध हिम आवरण: जनवरी से मार्च के दौरान उत्तरी गोलार्ध में सामान्य से थोड़ा कम हिम आवरण भी भारत में वर्षा का समर्थन कर सकता है।

IMD ने कहा है कि वर्तमान में भारतीय महासागर में तटस्थ IOD की स्थिति है, लेकिन इसके सकारात्मक होने की उम्मीद है।

आगे क्या?

मौसम विभाग मई के अंतिम सप्ताह में मानसून के स्थानिक वितरण और मासिक वितरण के बारे में अधिक विस्तृत और अद्यतन पूर्वानुमान जारी करेगा। यह पूर्वानुमान किसानों, जल संसाधन प्रबंधकों और नीति निर्माताओं को आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए योजना बनाने में मदद करेगा।

“अल नीनो की स्थिति के विकास के कारण, मानसून के दूसरे भाग (अगस्त-सितंबर) में वर्षा में कमी की उच्च संभावना है। हालांकि, सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD) की स्थिति इसे कुछ हद तक संतुलित कर सकती है।” – IMD के अधिकारी

मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)

  • भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2026 के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून के ‘सामान्य से कम’ रहने की भविष्यवाणी की है।
  • अल नीनो के विकसित होने की प्रबल संभावना इस पूर्वानुमान का मुख्य कारण है, जिससे मानसून के दूसरे भाग में वर्षा कम हो सकती है।
  • देश भर में कुल वर्षा, दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 92% रहने का अनुमान है, जिसमें 35% संभावना ‘कम वर्षा’ (90% LPA से नीचे) की है।
  • यह पूर्वानुमान भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए चिंताजनक है, क्योंकि देश की लगभग 60% आबादी मानसून पर निर्भर है।
  • कम वर्षा से फसल उत्पादन, सिंचाई, पीने के पानी की उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD) और उत्तरी गोलार्ध में कम हिम आवरण जैसे कारक अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।
  • IMD मई के अंत में मानसून के वितरण पर अधिक विस्तृत पूर्वानुमान जारी करेगा।
  • यह स्थिति खाद्य मुद्रास्फीति और ग्रामीण उपभोग को भी प्रभावित कर सकती है।

यह महत्वपूर्ण है कि सरकार और संबंधित एजेंसियां ​​इस पूर्वानुमान के आधार पर आवश्यक कदम उठाएं ताकि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *