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रेजिडेंट डॉक्टरों के अमानवीय ड्यूटी घंटे: NHRC ने NMC से रिपोर्ट मांगी

रेजिडेंट डॉक्टरों के ‘अमानवीय’ ड्यूटी घंटों पर NHRC की कड़ी टिप्पणी, NMC से मांगी रिपोर्ट

नई दिल्ली: भारत में रेजिडेंट डॉक्टरों के काम के घंटों को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल रेजिडेंट्स के लिए 24 से 72 घंटे तक की “अमानवीय और अनियंत्रित” ड्यूटी शिफ्ट को लेकर चिंता जताई है। आयोग ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को दो सप्ताह के भीतर इस मामले पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। यह कदम एक शिकायत के बाद उठाया गया है, जिसमें रेजिडेंट डॉक्टरों, विशेष रूप से दिव्यांग (PwD) छात्रों पर अत्यधिक काम का बोझ डालने का आरोप लगाया गया है, जो कि मौजूदा नियमों का उल्लंघन है।

लंबी ड्यूटी शिफ्टों का गंभीर प्रभाव

रेजिडेंट डॉक्टर, जो भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की रीढ़ माने जाते हैं, लंबे समय से अत्यधिक काम के बोझ और थकावट से जूझ रहे हैं। संसदीय समितियों की रिपोर्टों और विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि स्टाफ की कमी के कारण, इन युवा डॉक्टरों को अक्सर 24 से 36 घंटे तक लगातार काम करना पड़ता है। इस थकावट का सीधा असर न केवल उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, बल्कि यह मरीजों की सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा पैदा करता है।

  • थकावट और चिकित्सीय त्रुटियां: अत्यधिक लंबे समय तक काम करने से डॉक्टरों की एकाग्रता में कमी आती है, जिससे चिकित्सीय त्रुटियों की संभावना बढ़ जाती है। हार्वर्ड वर्क आवर्स, हेल्थ एंड सेफ्टी ग्रुप के एक अध्ययन में पाया गया कि 24 घंटे या उससे अधिक समय तक काम करने वाले रेजिडेंट डॉक्टरों द्वारा गंभीर त्रुटियां करने की संभावना 35.9% अधिक होती है।
  • मानसिक स्वास्थ्य पर असर: लंबे ड्यूटी घंटे, नींद की कमी, और निरंतर दबाव रेजिडेंट डॉक्टरों में तनाव, चिंता और अवसाद का कारण बन रहे हैं। राष्ट्रीय कार्यबल (2024) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 150 से अधिक मेडिकल छात्रों की आत्महत्याओं को संस्थागत उपेक्षा और पुराने तनाव से जोड़ा गया है।
  • शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: लगातार काम करने से डॉक्टरों में पीठ दर्द, सिरदर्द, पाचन संबंधी विकार और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली जैसी समस्याएं आम हो गई हैं।

नियामक ढांचे का अभाव और उल्लंघन

हालांकि, 1992 की यूनिफॉर्म सेंट्रल रेजिडेंसी स्कीम के तहत रेजिडेंट डॉक्टरों के ड्यूटी घंटों को प्रति सप्ताह 48 घंटे और प्रति दिन 12 घंटे तक सीमित किया गया था, लेकिन विभिन्न रिपोर्टों से पता चलता है कि इन नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जा रहा है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के 2023 के पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशंस (PGMER) में “उचित कार्य घंटे” का उल्लेख तो है, लेकिन इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, जिससे संस्थानों को नियमों का उल्लंघन करने की छूट मिल जाती है।

“ऐसे अंतराल, विशेष रूप से नैदानिक ​​और फ्रंटलाइन श्रेणियों में, सेवा वितरण, रोगी सुरक्षा, अकादमिक पर्यवेक्षण और समग्र संस्थागत दक्षता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने की संभावना है।” – संसदीय समिति की रिपोर्ट

एनएचआरसी ने अपनी संज्ञान में लिया है कि ये आरोप “पीड़ितों के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन” हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है, जहां यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) ने 1992 की योजना को सख्ती से लागू करने की मांग की है।

दिव्यांग (PwD) रेजिडेंट डॉक्टरों पर अतिरिक्त बोझ

शिकायत में विशेष रूप से दिव्यांग (PwD) रेजिडेंट डॉक्टरों के सामने आने वाली अतिरिक्त कठिनाइयों पर भी प्रकाश डाला गया है। उन्हें उचित आवास, बेहतर बुनियादी ढांचे और प्रभावी शिकायत निवारण प्रणालियों की कमी का सामना करना पड़ता है, जो विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के अधिनियम, 2016 का उल्लंघन करता है।

आगे की राह: सुधारात्मक उपाय और उम्मीदें

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए, एनएचआरसी की कार्रवाई एक महत्वपूर्ण कदम है। आयोग ने एनएमसी और स्वास्थ्य मंत्रालय से दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी है, जिससे उम्मीद है कि इस मुद्दे पर ध्यान दिया जाएगा और सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी। महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने पहले ही 48 घंटे प्रति सप्ताह के नियम को सख्ती से लागू करने की दिशा में कदम उठाए हैं, जो एक सकारात्मक संकेत है। यह आवश्यक है कि ऐसे नियम पूरे देश में लागू हों और उनका कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि हमारे डॉक्टरों के स्वास्थ्य और कल्याण की रक्षा की जा सके, और बदले में, मरीजों को बेहतर देखभाल मिल सके।

मुख्य बातें

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने रेजिडेंट डॉक्टरों के लंबे और “अमानवीय” ड्यूटी घंटों पर चिंता जताई है।
  • आयोग ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है।
  • रेजिडेंट डॉक्टरों को अक्सर 24 से 72 घंटे तक लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है, जो मौजूदा नियमों का उल्लंघन है।
  • लंबी ड्यूटी घंटों से चिकित्सीय त्रुटियों, मानसिक तनाव, अवसाद और शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
  • 1992 की यूनिफॉर्म सेंट्रल रेजिडेंसी स्कीम के तहत ड्यूटी घंटे सीमित हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है।
  • दिव्यांग (PwD) रेजिडेंट डॉक्टरों को अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
  • सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले पर सुनवाई चल रही है।
  • महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने 48 घंटे प्रति सप्ताह के नियम को लागू करने की दिशा में कदम उठाए हैं।
  • मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने और डॉक्टरों के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियमों के प्रवर्तन की आवश्यकता है।

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