नई दिल्ली: देश के डिजिटल भुगतान तंत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के केंद्र सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने अधिवक्ता अंजन दत्ता द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत के इस रुख के बाद 15 अक्टूबर 2026 से तय प्रारूप के अनुसार बड़े मर्चेंट लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क लागू होने का रास्ता साफ हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की दलील: ‘96% नागरिक दायरे से बाहर’
ThePrint की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एन. वेंकटरमण ने पीठ को बताया कि इस व्यवस्था से 96 प्रतिशत से अधिक उपयोगकर्ता पूरी तरह मुक्त रहेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था के तहत सरकार अपने लिए एक भी रुपया नहीं ले रही है। यह राशि न तो कोई नया टैक्स है और न ही अनिवार्य प्रशासनिक फीस।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि एमडीआर दरअसल डिजिटल पेमेंट एग्रीगेटर्स और बैंकों के बीच का तकनीकी निपटान शुल्क (Settlement Fee) है, जिसका उद्देश्य भुगतान तंत्र के रखरखाव और सुरक्षा ढांचे को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार इस वित्तीय लेन-देन से पूरी तरह अलग है और आम नागरिकों पर इसका कोई प्रत्यक्ष भार नहीं पड़ेगा।
अदालत की संवैधानिक टिप्पणी: ‘क्या यह कर है या शुल्क?’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने व्यवस्था के विधिक आधार पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि यदि यह कोई टैक्स नहीं है और न ही औपचारिक फीस, तो इस कटौती को लागू करने का कार्यकारी प्राधिकार क्या है? अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि इस मामले में वैधानिक पहलुओं के साथ तकनीकी बारीकियां जुड़ी हैं, जिन्हें समझने के लिए सरकार के आधिकारिक जवाब की आवश्यकता है।
पीठ ने केंद्र को संक्षिप्त हलफनामा प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए कहा कि वह रिकॉर्ड पर देखना चाहती है कि ₹2,000 से अधिक के भुगतानों पर यह शुल्क लागू करने का तार्किक आधार क्या है। जब याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया कि जवाब दाखिल होने तक नियम पर रोक लगा दी जाए, तो अदालत ने साफ शब्दों में अंतरिम रोक लगाने से मना कर दिया।
15 अक्टूबर से लागू होने वाला MDR ढांचा: लेन-देनवार विवरण
वित्त मंत्रालय और एनपीसीआई द्वारा जारी आधिकारिक विनियामक ढांचे के तहत यूपीआई भुगतानों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है। प्रमुख नियम और दरें नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत हैं:
| लेन-देन का प्रकार (Category) | भुगतान की सीमा (Amount Slab) | प्रस्तावित MDR दर | अधिकतम सीमा (Cap) | उपभोक्ता और व्यापारी पर प्रभाव |
|---|---|---|---|---|
| व्यक्ति से व्यक्ति (P2P Transfer) | किसी भी राशि का हस्तांतरण | 0.00% (पूरी तरह निशुल्क) | लागू नहीं | नागरिकों के आपसी लेन-देन पर शून्य शुल्क जारी |
| छोटे मर्चेंट भुगतान (Small P2M) | ₹2,000 तक की खरीदारी | 0.00% (पूरी तरह निशुल्क) | लागू नहीं | किराना, सब्जी व खुदरा दुकानों पर कोई असर नहीं |
| बड़े मर्चेंट भुगतान (Commercial P2M) | ₹2,000 से अधिक के लेन-देन | 0.40% (प्रति लेन-देन) | ₹300 (₹75,000+ पर) | व्यापारी द्वारा देय, ग्राहक से वसूली नहीं |
| आवश्यक सेवाएं (रेल, ईंधन, बीमा, कृषि) | ₹2,000 से अधिक के लेन-देन | ₹5.00 (फ्लैट प्रति लेन-देन) | ₹5 का स्थिर कैप | कम मार्जिन वाले क्षेत्रों पर न्यूनतम असर |
| शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड व सिक्योरिटीज | ब्रोकर्स व डीलर्स को भुगतान | 0.02% (प्रति लेन-देन) | अधिकतम ₹300 | वित्तीय निवेशकों के लिए रियायती दर |
| रुपे डेबिट कार्ड (RuPay Debit Card) | बिना किसी मौद्रिक सीमा के | 0.00% (पूरी तरह शून्य) | शून्य शुल्क सुरक्षा | स्वदेशी कार्ड भुगतान प्रणाली को बढ़ावा जारी |
याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें और कानूनी आपत्तियां
The Hindu की रिपोर्ट के मुताबिक, जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता अंजन दत्ता ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। याचिका में आरोप है कि यह संशोधन कार्यपालिका को बिना स्पष्ट संसदीय दिशा-निर्देश के यह तय करने की शक्ति देता है कि किस माध्यम को शुल्क मुक्त रखा जाए।
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क है कि छह वर्षों तक यूपीआई को निशुल्क रखने के बाद केवल प्रेस विज्ञप्ति और एफएक्यू के जरिए ऐसा वित्तीय भार नहीं थोपा जा सकता। इसके अतिरिक्त याचिका में यह भी कहा गया है कि जहां रुपे डेबिट कार्ड को असीमित राशि तक शून्य शुल्क का संरक्षण है, वहीं यूपीआई पर ₹2,000 से ऊपर शुल्क लगाना मनमाना है। इससे छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) पर बोझ पड़ेगा और डिजिटल समावेशन के लक्ष्य को झटका लग सकता है।
आरबीआई और बैंकिंग सेक्टर का पक्ष: क्यों जरूरी हुआ MDR?
केंद्रीय बैंक और डिजिटल पेमेंट उद्योग से जुड़े जानकारों का मानना है कि यूपीआई का मासिक लेन-देन वॉल्यूम अब 15 अरब के आंकड़े को पार कर चुका है, जिसमें हर महीने लाखों करोड़ रुपये प्रोसेस होते हैं। इस विशाल नेटवर्क के संचालन के लिए अत्याधुनिक सर्वर, हाई-स्पीड डेटा सेंटर, साइबर सुरक्षा और 24 घंटे बैकएंड इंफ्रास्ट्रक्चर की दरकार होती है। अब तक सरकार इसकी भरपाई बजटीय सब्सिडी के जरिए आंशिक रूप से करती आ रही थी।
बैंकिंग क्षेत्र का तर्क है कि जब तक बैंकों और पेमेंट ऐप्स को राजस्व का कोई टिकाऊ स्रोत नहीं मिलेगा, तब तक इस डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का आधुनिकीकरण संभव नहीं होगा। 0.4 प्रतिशत का यह शुल्क अंतरराष्ट्रीय कार्ड नेटवर्क की तुलना में नगण्य है और इसका भार आम ग्राहक पर नहीं, बल्कि बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के परिचालन खर्च के रूप में देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष और आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक से इनकार के बाद अब 15 अक्टूबर 2026 से देश के डिजिटल भुगतान परिदृश्य में नया चरण शुरू होगा। आम नागरिकों के लिए राहत की बात यह है कि रोजमर्रा के लेन-देन, आपसी ट्रांसफर और ₹2,000 तक की खरीदारी पहले की तरह निशुल्क रहेगी। केंद्र सरकार द्वारा चार सप्ताह में प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब से यह तय होगा कि कार्यपालिका का यह नीतिगत फैसला न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर कितना खरा उतरता है। फिलहाल, डिजिटल अर्थव्यवस्था के स्थायित्व और निष्पक्षता के बीच संतुलन साधने की यह बहस आने वाले दिनों में वित्तीय क्षेत्र को नई दिशा देगी।













