नई दिल्ली: देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) और नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म 6 (Form 6) में किए गए एकतरफा बदलावों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज तक पहुंच गया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सोमवार को चुनाव आयोग (ECI) और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा फॉर्म 6 में किए गए किसी भी संशोधन को शीर्ष अदालत की मंजूरी प्राप्त नहीं थी। इस अदालती टिप्पणी के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए निर्वाचन सदन तक विरोध मार्च निकाला, वहीं चुनावी शुचिता और संस्थागत स्वतंत्रता पर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है。
सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक: ‘हमने फॉर्म 6 में बदलाव को मंजूरी नहीं दी’
The Hindu की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा लिए गए एकतरफा प्रशासनिक फैसलों को चुनौती दी गई थी। वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि आयोग ने 26 सितंबर की प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया था कि फॉर्म 6 में नया घोषणा पत्र सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर जोड़ा गया है。
इस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने खुली अदालत में कहा, “हम यह स्पष्ट कर रहे हैं कि फॉर्म 6 में किए गए किसी भी तरह के संशोधन हमारी अदालत द्वारा नहीं किए गए हैं और न ही इसे हमारी मंजूरी मिली है।” LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने केंद्र और आयोग को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई तक मामले से जुड़े सभी आधिकारिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है。
एसआईआर प्रक्रिया, 13.3 करोड़ कटे नाम और कानूनी विवाद का ब्योरा
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और फॉर्म 6 में हुए बदलावों से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम और आंकड़ों का आधिकारिक विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:
| विषय / प्रमुख बिंदु | विवादित प्रावधान एवं आंकड़े | सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी | राजनीतिक व प्रशासनिक प्रभाव |
|---|---|---|---|
| फॉर्म 6 का नया अपेंडिक्स | नए मतदाताओं के लिए अतिरिक्त और कठिन निवास सत्यापन घोषणा पत्र | अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने इस संशोधन को मंजूरी नहीं दी है | नए वोटरों के नाम जुड़ने में अत्यधिक प्रशासनिक देरी के आरोप |
| हटाए गए कुल मतदाताओं की संख्या | विभिन्न राज्यों में लगभग 13.3 करोड़ नाम मतदाता सूची से बाहर | याचिकाकर्ताओं द्वारा बड़े पैमाने पर मनमाने निष्कासन का आरोप | विपक्ष ने इसे व्यापक ‘वोट चोरी’ का सुनियोजित प्रयास करार दिया |
| अनुपस्थित/स्थानांतरित श्रेणी (ASD) | हटाए गए नामों में 71% से अधिक को ‘अनुपस्थित या स्थानांतरित’ बताया | जमीनी सत्यापन और बीएलओ प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल | लाखों वैध नागरिकों के मताधिकार छिनने की गंभीर आशंका |
| मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका | आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा आदेश के आरोप | आयोग减 निर्णयों पर चार सप्ताह में जवाब तलब | पूर्व नौकरशाहों द्वारा महाभियोग और इस्तीफे की मांग |
| विपक्ष का देशव्यापी अभियान | 10 से 20 अक्टूबर तक ‘वोट बचाओ’ और 26 नवंबर को दिल्ली मार्च | शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार की रक्षा की बात | मतदान केंद्रों पर ‘वोट रक्षक’ की तैनाती की घोषणा |
निर्वाचन सदन पर भारी घेराबंदी: इंडिया ब्लॉक का विरोध मार्च
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के अगले ही दिन मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में राजनीतिक हलचल तेज हो गई। कांग्रेस, सपा, टीएमसी, डीएमके और वाम दलों सहित 19 विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन के सांसदों ने संसद भवन से निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर संयुक्त विरोध मार्च निकाला। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग ने देश को गुमराह किया है और मतदाता सूची के साथ गंभीर खिलवाड़ किया जा रहा है。
दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों से निर्वाचन सदन के चारों ओर बैरिकेडिंग कर विपक्षी सांसदों को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके बाद विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संवैधानिक कार्रवाई की मांग की। विपक्षी दलों का कहना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ हैं और संस्थागत पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं हो सकता。
कांग्रेस का ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान और जमीनी रणनीति
The Hindu के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बैठक में राष्ट्रव्यापी आंदोलन की घोषणा की गई। पार्टी 10 से 20 अक्टूबर तक देश भर में ब्लॉक स्तर पर ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान चलाएगी। इस दौरान पार्टी कार्यकर्ता उन 13.3 करोड़ लोगों तक पहुंचेंगे जिनके नाम सूची से कटे हैं。
कांग्रेस प्रत्येक पोलिंग बूथ पर ‘वोट रक्षक’ तैनात करेगी, जो कटे हुए वैध मतदाताओं के नाम दोबारा दर्ज कराने में मदद करेंगे। यह अभियान 26 नवंबर को संविधान दिवस पर दिल्ली में महारैली के साथ संपन्न होगा। राहुल गांधी ने कहा कि वोट के अधिकार की रक्षा करना संविधान की रक्षा है。
भाजपा का पलटवार: ‘संस्थाओं की स्वतंत्रता का प्रमाण, राहुल फैला रहे भ्रम’
विपक्ष के हमलों पर भाजपा ने तीखा पलटवार किया है। भाजपा सांसद संबित पात्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी करना लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि अदालत ने फॉर्म 6 को कहीं भी अवैध नहीं ठहराया है। पात्रा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस चुनावी हार से ध्यान भटकाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मतदाता पुनरीक्षण एक नियमित प्रक्रिया है और विपक्ष केवल भ्रम फैला रहा है。
संवैधानिक मर्यादा, संस्थागत साख और आगे की कानूनी राह
Indian Express के कानूनी विश्लेषण के अनुसार, यह विवाद चुनाव आयोग की आंतरिक स्वायत्तता और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व है। आयोग के भीतर असहमति और शीर्ष अदालत के नाम का गलत संदर्भ दिए जाने के आरोपों से संस्था की साख पर असर पड़ा है। चार सप्ताह बाद सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई बेहद अहम होगी。
निष्कर्ष: चुनावी लोकतंत्र के लिए निर्णायक मोड़
फॉर्म 6 और मतदाता सूची पुनरीक्षण पर उपजा यह विवाद चुनावी पारदर्शिता की दृष्टि से निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख से मतदाताओं के अधिकारों के संरक्षण की उम्मीद बढ़ी है, वहीं चुनाव आयोग के समक्ष अपनी निष्पक्षता सिद्ध करने की चुनौती है। आगामी हफ्तों में अदालती सुनवाई और जमीनी पुनरीक्षण प्रक्रिया से देश की चुनावी राजनीति की दिशा तय होगी। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि हर पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहे。













