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महिला सुरक्षा: सुप्रीम कोर्ट सख्त, कैब ड्राइवरों की होगी जांच

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली-एनसीआर) में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने स्वत: संज्ञान याचिका पर सुनवाई करते हुए राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कई बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अपराध होने के बाद की जाने वाली कार्रवाई से कहीं ज्यादा जरूरी अपराध की रोकथाम है। अदालत ने दिल्ली सरकार और पुलिस को कैब व बस ड्राइवरों के अनिवार्य वेरिफिकेशन, शिक्षण संस्थानों के पास पुलिस गश्त बढ़ाने और शराब की दुकानों के आसपास अवैध जमावड़े को तुरंत खत्म करने का आदेश दिया है。

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘अपराधियों में कानून का खौफ होना जरूरी’

Bar and Bench की रिपोर्ट के मुताबिक, खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अपराधियों के मन में ऐसा डर होना चाहिए कि वे कोई भी गलत हरकत करने से पहले कांप जाएं। अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि जब तक बदमाशों में यह खौफ नहीं होगा कि ‘अगर कुछ किया तो बख्शे नहीं जाएंगे’, तब तक ऐसे अपराधों को रोकना संभव नहीं है। पीठ ने पुलिस को निर्देश दिया कि राजधानी में ऐसा माहौल बनाया जाए जिससे रात के समय भी महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर सकें。

सर्वोच्च अदालत ने अपराध विज्ञान की प्रसिद्ध ‘ब्रोकन विंडोज थ्योरी’ (Broken Windows Theory) का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि खराब स्ट्रीट लाइटें, बंद पड़े सीसीटीवी और अंधेरे रास्ते सिर्फ प्रशासनिक खामियां नहीं हैं, बल्कि ये असामाजिक तत्वों को अपराध के लिए बढ़ावा देते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर अनदेखी और पुलिस की गैर-मौजूदगी से बदमाशों के हौसले बुलंद होते हैं, जिसे तत्काल समाप्त करना आवश्यक है。

सार्वजनिक परिवहन और ऐप कैब ड्राइवरों का सख्त वेरिफिकेशन

The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने सार्वजनिक परिवहन को सुरक्षित बनाने के लिए कड़े नियम लागू किए हैं। सरकारी और निजी बसों, टैक्सियों, ऑटोरिक्शा और ओला, उबर, रैपिडो जैसी ऐप कैब के सभी चालकों का सघन पुलिस सत्यापन अनिवार्य कर दिया गया है। वाहनों के भीतर यात्रियों को दिखने वाली जगह पर ड्राइवर का नाम, लाइसेंस नंबर और सत्यापित फोटो लगाना होगा。

अदालत ने कमर्शियल वाहनों के अनाधिकृत उप-किराए (Sub-letting) पर पूर्ण रोक लगा दी है। गैर-सत्यापित ड्राइवर द्वारा वाहन चलाने पर गाड़ी को तुरंत जब्त किया जाएगा और लाइसेंस रद्द होगा। साथ ही सभी सार्वजनिक वाहनों में व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम (VTS) और आपातकालीन एसओएस (SOS) बटन का वास्तविक समय में चालू रहना अनिवार्य किया गया है。

सुप्रीम कोर्ट के 7 प्रमुख सुरक्षा निर्देश: महत्वपूर्ण विवरण

सर्वोच्च अदालत द्वारा दिल्ली-एनसीआर में महिला सुरक्षा पुख्ता करने के लिए जारी 7 मुख्य निर्देशों का विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:

सुरक्षा क्षेत्र सुप्रीम कोर्ट का मुख्य निर्देश जिम्मेदार विभाग दंडात्मक व कानूनी प्रावधान
कैब व बस चालक सत्यापन बसों, ऐप कैब और ऑटो चालकों का अनिवार्य पुलिस वेरिफिकेशन दिल्ली पुलिस व परिवहन विभाग उल्लंघन पर वाहन जब्ती व लाइसेंस रद्द
कंट्रोल रूम ‘वॉर रूम’ 24×7 समर्पित कमांड सेंटर और एसओएस अलर्ट्स पर त्वरित एक्शन मुख्य सचिव व पुलिस आयुक्त रिस्पॉन्स टाइम का कड़ा ऑडिट
स्कूल-कॉलेजों के पास गश्त शिक्षण संस्थानों और गर्ल्स पीजी हॉस्टलों के पास बीट पेट्रोलिंग स्थानीय पुलिस व पीसीआर क्यूआर कोड आधारित डिजिटल उपस्थिति
अवैध ढाबों पर कार्रवाई शराब दुकानों के पास भीड़ पर रोक और अवैध ढाबों का ध्वस्तीकरण एमसीडी व दिल्ली पुलिस अवैध दुकानें सील और सख्त कानूनी कार्रवाई
अंधेरे इलाकों में रोशनी खराब स्ट्रीट लाइटों को तुरंत ठीक करना और ब्लैक स्पॉट्स खत्म करना डीडीए, एनडीएमसी व पीडब्ल्यूडी लापरवाह अधिकारियों पर सीधी जवाबदेही
शिष्टाचार स्क्वॉड ऑडिट एंटी-ईव टीजिंग स्क्वॉड और ‘ऑपरेशन निर्भीक’ की समीक्षा रिपोर्ट दिल्ली पुलिस कमिश्नर पिछले 3 महीनों का साप्ताहिक रिपोर्ट कार्ड
नागरिक सुरक्षा बैठकें स्थानीय महिलाओं और छात्राओं के साथ नियमित संवाद बैठकें नामित नोडल पुलिस अधिकारी समस्याओं का समयबद्ध निस्तारण

अवैध शराब के अड्डों और अंधेरे ब्लैक स्पॉट्स पर कार्रवाई

LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने सड़कों किनारे अवैध रूप से चल रहे ढाबों और शराब के अहातों को तुरंत बंद करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि शराब दुकानों के आसपास असामाजिक तत्वों के जमावड़े से महिलाओं में असुरक्षा बढ़ती है। सड़कों पर अवैध रूप से खड़े रहने वाले भारी वाहनों को भी हटाने का निर्देश दिया गया है, जो अंधेरे में ब्लाइंड स्पॉट बनाते हैं。

पीठ ने दिल्ली पुलिस की महिला सुरक्षा इकाइयों के कामकाज पर सवाल उठाते हुए पुलिस आयुक्त से ‘शिष्टाचार स्क्वॉड’ और ‘ऑपरेशन निर्भीक’ की पिछले तीन महीनों की प्रगति रिपोर्ट मांगी है। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि ये विशेष टीमें केवल कागजों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर भी सक्रिय रूप से काम कर रही हों。

एमिकस क्यूरी की दलीलें: पुलिस बल में रिक्तियों की समस्या

मामले में अदालत की मदद कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी लिज मैथ्यू ने कैग (CAG) की 2020 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि दिल्ली पुलिस की बीट गश्त में करीब 39 फीसदी पद खाली हैं। पुलिस बल की इस कमी के कारण संवेदनशील इलाकों में नियमित गश्त प्रभावित होती है। उन्होंने गश्त की निगरानी के लिए क्यूआर-कोड और जियो-फेंसिंग तकनीक लागू करने की सिफारिश की。

प्रशासनिक जवाबदेही: शीर्ष अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि इन निर्देशों के अनुपालन का हलफनामा केवल दिल्ली के मुख्य सचिव और पुलिस आयुक्त द्वारा ही दाखिल किया जाएगा। यदि आदेशों के पालन में कोई लापरवाही पाई गई, तो इन दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि संबंधित विभागों की संयुक्त बैठकें शुरू हो चुकी हैं और निर्देशों को तेजी से लागू किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को होगी。

निष्कर्ष: राजधानी में भयमुक्त माहौल बनाने की दिशा में अहम कदम

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं की सुरक्षा को कागजी दावों से निकालकर जमीनी स्तर पर मजबूत करने वाला है। चालकों के सत्यापन, अंधेरे रास्तों को रोशन करने और प्रभावी पुलिस गश्त से निश्चित रूप से अपराधियों में खौफ पैदा होगा। अब प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह 16 नवंबर की सुनवाई से पहले इन सभी उपायों को पारदर्शी और कठोर तरीके से लागू करे, ताकि हर महिला बिना किसी डर के राजधानी में सुरक्षित आवागमन कर सके。

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