मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय द्विमासिक समीक्षा बैठक आगामी सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 से शुरू होने जा रही है। देश में बढ़ती खुदरा महंगाई, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख के बीच इस बैठक को वित्तीय बाजारों में बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। वित्तीय विश्लेषकों का अनुमान है कि केंद्रीय बैंक इस बैठक में मुख्य नीतिगत दर यानी रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत (25 बेसिस प्वाइंट्स) की बढ़ोतरी कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो फरवरी 2023 के बाद यानी पिछले साढ़े तीन वर्षों में यह पहला मौका होगा जब रिजर्व बैंक ब्याज दरों में इजाफा करेगा。
बैठक का शेड्यूल, समय और प्रमुख निर्णय की घोषणा
Livemint की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय एमपीसी की बैठक 5 से 7 अक्टूबर 2026 तक मुंबई मुख्यालय में आयोजित की जाएगी। बैठक के अंतिम दिन बुधवार, 7 अक्टूबर को सुबह 10:00 बजे गवर्नर संजय मल्होत्रा नीतिगत निर्णयों की घोषणा करेंगे। इसके बाद दोपहर 12:00 बजे गवर्नर वरिष्ठ अधिकारियों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे, जिसका सीधा प्रसारण आरबीआई के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर होगा。
रॉयटर्स द्वारा 18 से 28 सितंबर के बीच किए गए अर्थशास्त्रीय सर्वेक्षण में 60 प्रतिशत विशेषज्ञों ने माना है कि एमपीसी रेपो रेट को वर्तमान 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर सकती है। वर्ष 2025 में आर्थिक वृद्धि को सहारा देने के लिए दरों में कुल 125 बेसिस प्वाइंट्स की कटौती के बाद पिछली चार बैठकों से नीतिगत दरें 5.25 प्रतिशत पर स्थिर थीं। हालांकि, अब आर्थिक परिस्थितियों में आए बदलावों ने सख्त मौद्रिक रुख का दबाव बढ़ा दिया है。
मौद्रिक नीति समिति (MPC) के सदस्य और नीतिगत ढांचा
मौद्रिक नीति समिति छह सदस्यीय सांविधिक निकाय है, जिसमें रिजर्व बैंक के तीन आंतरिक अधिकारी और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त तीन बाहरी अर्थशास्त्री शामिल हैं। समिति का नेतृत्व पदेन अध्यक्ष के रूप में गवर्नर संजय मल्होत्रा कर रहे हैं। उनके साथ केंद्रीय बैंक से मौद्रिक नीति विभाग की प्रभारी डिप्टी गवर्नर डॉ. पूनम गुप्ता और कार्यकारी निदेशक इंद्रनील भट्टाचार्य शामिल हैं。
वहीं बाहरी स्वतंत्र सदस्यों में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक प्रो. राम सिंह, प्रख्यात अर्थशास्त्री सौगत भट्टाचार्य और आईएसआईडी (ISID) के महानिदेशक डॉ. नागेश कुमार शामिल हैं। छह सदस्यों वाली यह समिति प्रत्येक दो महीने में घरेलू अर्थव्यवस्था, मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटा और विदेशी मुद्रा विनिमय दर का आकलन कर बहुमत के आधार पर ब्याज दरें तय करती है。
रेपो रेट और प्रमुख आर्थिक संकेतकों का तुलनात्मक विवरण
आरबीआई एमपीसी की आगामी समीक्षा बैठक के संदर्भ में वर्तमान वित्तीय स्थिति और संभावित बदलावों का तुलनात्मक परिदृश्य नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:
| वित्तीय संकेतक / पैमाना | वर्तमान स्थिति (अक्टूबर 2026) | प्रस्तावित / अपेक्षित स्तर | संभावित प्रभाव / बाजार प्रतिक्रिया |
|---|---|---|---|
| आरबीआई रेपो रेट (Repo Rate) | 5.25% (स्थिर) | 5.50% (+25 bps बढ़ोतरी) | होम लोन, ऑटो लोन की ईएमआई में सीधा इजाफा |
| खुदरा मुद्रास्फीति (CPI Inflation) | 4.82% (अगस्त 2026) | लगातार तीसरे माह 4% से ऊपर | खाद्य और ईंधन की कीमतों से महंगाई पर दबाव |
| ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) | $100 – $108 प्रति बैरल | उच्च स्तर पर बरकरार | आयात बिल में वृद्धि और कैड पर सीधा असर |
| भारतीय रुपया (USD / INR) | ₹95.80 – ₹96.00 प्रति डॉलर | दबाव में गिरावट जारी | आयातित महंगाई और पूंजी बहिर्वाह का जोखिम |
| सकल जीएसटी संग्रह (Gross GST) | ₹2.03 लाख करोड़ (सितंबर 2026) | 14.7% वार्षिक वृद्धि | घरेलू मांग और आर्थिक गतिविधियों में मजबूती |
| बैंक ऑफ अमेरिका (BofA) अनुमान | 5.25% वर्तमान दर | 6.25% (H1 2027 तक) | आगामी महीनों में 100 bps कुल बढ़ोतरी संभव |
दर वृद्धि की आशंका के पीछे तीन प्रमुख आर्थिक कारण
पहला प्रमुख कारण घरेलू खुदरा मुद्रास्फीति का बढ़ता स्तर है। अगस्त 2026 के आंकड़ों में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से लगातार तीसरे महीने ऊपर है। आगामी त्योहारी सीजन में उपभोक्ता मांग बढ़ने और खाद्य पदार्थों के दामों में तेजी से इसके 5 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है。
दूसरा कारण पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं। ब्रेंट क्रूड लगातार $100 प्रति बैरल के पार बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिससे आयात लागत बढ़ने के साथ रुपया ₹96 के स्तर तक फिसल चुका है। तीसरा कारक अमेरिकी फेड द्वारा ब्याज दरों को ऊंचा रखना है, जिससे पूंजी बहिर्वाह का दबाव बना हुआ है。
मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था: जीएसटी संग्रह ₹2 लाख करोड़ पार
जहां मुद्रास्फीति चिंता का विषय है, वहीं भारत की वास्तविक अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है। The Hindu के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में देश का सकल जीएसटी संग्रह 14.7 प्रतिशत बढ़कर ₹2.03 लाख करोड़ के पार निकल गया। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि वि পুনরাवृत्त है कि विनिर्माण और घरेलू मांग में मजबूती बरकरार है। मजबूत आर्थिक विकास केंद्रीय बैंक को महंगाई नियंत्रित करने के लिए दरें बढ़ाने की नीतिगत सहूलियत प्रदान करता है。
आम आदमी और होम लोन ग्राहकों पर क्या होगा असर?
यदि आरबीआई मौद्रिक नीति समिति 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोतरी करती है, तो इसका सीधा असर कर्जदारों पर पड़ेगा। बैंकों की लोन ब्याज दरें सीधे रेपो रेट से जुड़ी होती हैं। ऐसे में प्रमुख वाणिज्यिक बैंक तुरंत अपनी लोन दरों में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि कर देंगे。
उदाहरण के लिए, ₹50 लाख के 20 वर्षीय होम लोन पर ब्याज दर 8.50 से बढ़कर 8.75 प्रतिशत होने पर मासिक ईएमआई में लगभग ₹800 से ₹1,000 की वृद्धि हो जाएगी। वहीं दूसरी तरफ, वरिष्ठ नागरिकों और फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश करने वाले आम बचतकर्ताओं को बैंकों द्वारा एफडी ब्याज दरों में बढ़ोतरी किए जाने से बेहतर रिटर्न मिलेगा。
शेयर बाजार और विश्लेषकों का नजरिया
बैंक ऑफ अमेरिका (BofA) के अर्थशास्त्रियों के अनुसार केंद्रीय बैंक अक्टूबर से दर वृद्धि का चक्र शुरू कर सकता है। ब्रोकरेज का अनुमान है कि दिसंबर 2026 में 25 बेसिस प्वाइंट्स और वर्ष 2027 की पहली छमाही में अतिरिक्त 50 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे दर 6.25 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। शेयर बाजार में ब्याज दरें बढ़ने से बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है。
ब्रिकवर्क रेटिंग्स के रिसर्च हेड राजीव शरण के मुताबिक, ब्याज दर चक्र पलटने की कगार पर है और दर कटौती का विकल्प समाप्त हो चुका है। हालांकि, यदि समिति मुद्रास्फीति को नियंत्रित मानती है, तो वह दरें स्थिर रखकर सख्त हॉकिश रुख अपना सकती है। लेकिन बाजार की नजरें 7 अक्टूबर को गवर्नर संजय मल्होत्रा के नीतिगत वक्तव्य और भविष्य के मार्गदर्शन पर टिकी रहेंगी。













