Home / Uncategorized / नुआखाई 2026: मां समलेश्वरी को नवान्न, पश्चिमी ओडिशा में जश्न

नुआखाई 2026: मां समलेश्वरी को नवान्न, पश्चिमी ओडिशा में जश्न

संबलपुर / भुवनेश्वर: पश्चिमी ओडिशा के सबसे बड़े और पावन कृषि लोकपर्व ‘नुआखाई’ (Nuakhai 2026) की गूंज मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को पूरे क्षेत्र में भक्ति, उल्लास और सामाजिक समरसता के साथ सुनाई दी। भाद्रपद शुक्ल पंचमी यानी गणेश चतुर्थी के अगले दिन मनाए जाने वाले इस महापर्व पर किसानों ने नई धान की फसल का पहला अन्न अपने आराध्य देवी-देवताओं को समर्पित किया। संबलपुर स्थित अधिष्ठात्री देवी मां समलेश्वरी, बलांगीर की मां पाटणेश्वरी, सुवर्णपुर की मां सुरेश्वरी और कालाहांडी की मां मणिकेश्वरी के मंदिरों में सुबह से ही लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। नए वस्त्रों में सजे-धजे लोगों ने ‘नुआखाई जुहार’ की पारंपरिक परंपरा का निर्वहन करते हुए बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लिया और छोटों को स्नेह दिया, जिससे समूचा पश्चिमी ओडिशा उत्सव के रंगों में सराबोर नजर आया।

मां समलेश्वरी मंदिर में नवान्न अर्पण का पावन मुहूर्त

The Week की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, संबलपुर के ऐतिहासिक मां समलेश्वरी मंदिर में तय लग्न और शुभ मुहूर्त के दौरान नई फसल के चावल से तैयार ‘नवान्न’ (Nabanna) विधिवत अर्पित किया गया। पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे ढाक, ढोल और निशान की गूंज के बीच मां समलेश्वरी को पहला भोग लगाया। इसके बाद इस पावन नवान्न प्रसाद को भक्तों और श्रद्धालुओं में वितरित किया गया。

नुआखाई का यह उत्सव केवल संबलपुर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बरगढ़, झारसुगुड़ा, बलांगीर, सोनपुर, कालाहांडी, नुआपाड़ा, देवगढ़, सुंदरगढ़ और नबरंगपुर सहित पश्चिमी ओडिशा के 10 से अधिक जिलों में अत्यंत श्रद्धाभाव से मनाया गया। इसके साथ ही सीमावर्ती राज्य छत्तीसगढ़ के रायगढ़, महासमुंद और बिलासपुर तथा झारखंड के कुछ इलाकों में भी उड़िया समुदाय ने इस पारंपरिक पर्व को पूरे उत्साह के साथ मनाया। गांवों में हर घर की दहलीज पर सुबह से ही पारंपरिक अल्पनाएं सजाई गईं और किसान परिवारों ने प्रकृति व धरती मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की。

नुआखाई महापर्व के नौ प्रमुख चरण और उनका पारंपरिक महत्व

नुआखाई केवल एक दिन का त्योहार नहीं है, बल्कि यह हफ्तों पहले शुरू होने वाली एक अनुशासित सांस्कृतिक व सामाजिक प्रक्रिया है। पारंपरिक शास्त्रों के अनुसार नुआखाई के नौ प्रमुख चरण निर्धारित हैं, जिनका पालन सदियों से किया जा रहा है। नीचे दी गई तालिका में इन सभी नौ चरणों और उनकी महत्ता का विस्तृत विवरण प्रस्तुत है:

क्रम धार्मिक चरण (रीति-नीति) अनुष्ठान का स्वरूप सांस्कृतिक एवं सामाजिक उद्देश्य
1 बेहराण (Beherana) गांव के बुजुर्गों और पुरोहितों की संयुक्त बैठक त्योहार के आयोजन और व्यवस्था की रूपरेखा तय करना
2 लग्न निर्धारण (Lagna Dekha) ज्योतिषियों द्वारा नवान्न भोग का शुभ मुहूर्त तय करना मां समलेश्वरी को भोग अर्पित करने का समय निर्धारित करना
3 डाक हका (Daka Haka) गांव-गांव जाकर पर्व की तिथि और मुहूर्त की उद्घोषणा समुदाय के प्रत्येक परिवार को उत्सव के लिए आमंत्रित करना
4 सप-सफा (Sap-Sapha) घरों, आंगनों और पूजा स्थलों की विशेष साफ-सफाई नकारात्मक ऊर्जा दूर कर घर को पावन व स्वच्छ बनाना
5 किना-बिका (Kina Bika) नए वस्त्रों, पूजा सामग्री और बर्तनों की खरीदारी स्थानीय बुनकरों, शिल्पकारों और व्यापारियों को प्रोत्साहन
6 नुआ धान अनयन (Nua Dhan Anayan) खेतों से नई पकी धान की बालियों को काटकर घर लाना प्रकृति के उपहार और अन्नदाता के श्रम का सम्मान
7 नवान्न प्रस्तुति (Nabanna Lagi) नए चावल, दूध, गुड़ और मेवों से भोग तैयार करना कुलदेवी और ग्राम देवी-देवताओं को प्रथम नैवेद्य अर्पण
8 नुआ खाई (Nua Khai) परिवार के सभी सदस्यों द्वारा एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण पारिवारिक एकजुटता, प्रेम और आपसी तालमेल को सुदृढ़ करना
9 जुहार भेंट (Juhar Bhet) बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना और छोटों को प्यार देना मनमुटाव भुलाकर सामाजिक सौहार्द व भाईचारे की स्थापना

‘नुआखाई जुहार’: पारिवारिक एकता और बड़ों के सम्मान का पावन संदेश

News On AIR (आकाशवाणी) की रिपोर्ट के अनुसार, नुआखाई पर्व का सबसे भावुक और सुंदर पहलू ‘नुआखाई जुहार’ है। नवान्न भोग ग्रहण करने के बाद परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य से लेकर सबसे छोटे बच्चे तक एक कतार में खड़े होते हैं। युवा और बच्चे अपने माता-पिता और बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर ‘नुआखाई जुहार’ कहते हैं, जिसके बदले में बुजुर्ग उन्हें दीर्घायु, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। समवयस्क गले मिलकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं。

इस अनूठी परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यदि किसी परिवार या पड़ोस में पहले से कोई मतभेद, विवाद या कड़वाहट चल रही हो, तो नुआखाई जुहार के दिन उसे पूरी तरह भुला दिया जाता है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर चरण छूते हैं और नए सिरे से रिश्तों की शुरुआत करते हैं। रोजगार या पढ़ाई के सिलसिले में देश-विदेश में रहने वाले लोग भी इस दिन अपने पैतृक गांव अवश्य लौटते हैं, जिससे नुआखाई पारिवारिक पुनर्मिलन का महापर्व बन जाता है。

संबलपुरी हथकरघा और लोक कला: दलखई व रसरकेली की धूम

नुआखाई के अवसर पर पश्चिमी ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक और वस्त्र धरोहर भी पूरी छटा के साथ खिल उठती है। इस दिन हर पुरुष, महिला और बच्चा संबलपुरी इकत हथकरघा परिधान पहनता है। महिलाएं पारंपरिक संबलपुरी साड़ियों में सजती हैं, जबकि पुरुष संबलपुरी कुर्ते और गमछे धारण करते हैं। इससे क्षेत्र के स्थानीय बुनकरों और हथकरघा कारीगरों को भी व्यापक आर्थिक संबल मिलता है。

शाम ढलते ही गांवों और कस्बों में लोक संगीत और नृत्यों का दौर शुरू हो जाता है। नुआखाई भेंटघाट कार्यक्रमों में स्थानीय कलाकारों द्वारा ‘दलखई’ (Dalkhai), ‘रसरकेली’ (Rasarkeli), ‘जयफूल’ और ‘सजनी’ जैसे प्रसिद्ध संबलपुरी लोकगीतों और नृत्यों की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुतियां दी जाती हैं। ढोल, मांदर, निशान और ताशा की थाप पर युवा और बुजुर्ग मिलकर झूमते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र का माहौल उल्लास और उमंग से भर जाता है。

पारंपरिक व्यंजन: पीठा, खीर और अंबिल का सामूहिक भोज

Prameya News की रिपोर्ट के अनुसार, नुआखाई के दिन हर घर में विशेष पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। नए चावल के साथ तैयार खीर, मीठा नवान्न और पारंपरिक पीठा जैसे काकरा (Kakara), आरिसा (Arisa) और मंडा (Manda) पीठा मुख्य रूप से बनाए जाते हैं। इसके साथ ही विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियों, बांस की कोपलों (करदी) और खट्टे स्वाद वाले विशेष सूप ‘अंबिल’ (Ambil) का विशेष भोज परोसा जाता है। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी संबलपुर में स्थानीय नागरिकों और कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर बैठकर पत्तलों में पारंपरिक नवान्न भोज का आनंद लिया。

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दी शुभकामनाएं: राष्ट्रीय पटल पर पहचान

नुआखाई के इस पावन अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो स्वयं ओडिशा की मिट्टी से आती हैं, ने देशवासियों और विशेष रूप से ओडिशा के नागरिकों को हार्दिक बधाई दी। राष्ट्रपति ने अपने संदेश में कहा कि नुआखाई केवल एक त्योहार नहीं बल्कि सामाजिक समरसता, पारिवारिक जुड़ाव और हमारे अन्नदाता किसानों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है। उन्होंने कामना की कि यह पर्व सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए。

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया मंच एक्स पर ‘नुआखाई जुहार’ कहते हुए देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। प्रधानमंत्री ने अन्नदाता किसानों के अथक परिश्रम की सराहना करते हुए कहा कि नुआखाई भारत की कृषि प्रधान संस्कृति और सामूहिक भाईचारे का अनुपम उदाहरण है। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी जनता को शुभकामनाएं दीं और राज्य की प्रगति का संकल्प दोहराया。

निष्कर्ष: कृषि संस्कृति और सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल

आधुनिकता और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच नुआखाई जैसे लोकपर्व हमें अपनी जड़ों, अपनी माटी और मानवीय संवेदनाओं से जोड़े रखने का अनमोल काम करते हैं। प्रकृति और अन्न के प्रति आभार, श्रम का आदर, बड़ों का सम्मान और आपसी कटुता को मिटाकर प्रेम बांटने की यह पावन परंपरा भारतीय सांस्कृतिक विविधता का गौरव है। पश्चिमी ओडिशा का यह पारंपरिक पर्व पूरे देश को यह सिखाता है कि प्रकृति के उपहारों को मिल-बांटकर भोगना और संबंधों को संजोकर रखना ही मानव जीवन की सच्ची सार्थकता है。

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *