नई दिल्ली: भारत की अध्यक्षता में राष्ट्रीय राजधानी के भारत मंडपम में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पहले दिन सदस्य देशों ने ऐतिहासिक ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में 11 सदस्यीय विस्तारित ब्रिक्स समूह के शीर्ष नेताओं ने वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के पुनर्गठन और शांति बहाली पर गहन मंथन किया। पश्चिम एशिया तनाव के बीच ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के मध्य सहमति बनने के बाद घोषणापत्र को अंतिम रूप दिया गया, जिसे भारतीय कूटनीति की अत्यंत महत्वपूर्ण जीत माना जा रहा है。
‘नियम मानने वाले से नियम बनाने वाले बनें’: प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान
The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिखर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को मजबूती से रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि 21वीं सदी की बहुध्रुवीय दुनिया में विकासशील देशों को केवल नियमों का पालन करने वाला (Rule-takers) नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के नियम तय करने वाला (Rule-shapers) बनना होगा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), विश्व व्यापार संगठन (WTO) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में तत्काल प्रभाव से संरचनात्मक सुधारों की पुरजोर वकालत की。
प्रधानमंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और आर्थिक अनिश्चितताओं के इस दौर में ब्रिक्स समूह वैश्विक स्थिरता का मजबूत स्तंभ बन सकता है। सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान सहित कई विश्व नेताओं ने शिरकत की。
नई दिल्ली घोषणापत्र के प्रमुख बिंदु और सहमति का खाका
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में स्वीकृत नई दिल्ली घोषणापत्र में वैश्विक शांति, सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय शासन प्रणाली के पुनर्गठन पर दृढ़ रुख अपनाया गया है। प्रमुख समझौतों और रणनीतिक प्रावधानों का आधिकारिक विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:
| घोषणापत्र का प्रमुख स्तंभ | स्वीकृत नीतिगत निर्णय एवं प्रावधान | भारत का रणनीतिक रुख | वैश्विक कूटनीतिक प्रभाव |
|---|---|---|---|
| परमाणु सुरक्षा एवं शांति | नागरिक ढांचे और IAEA निगरानी वाले परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की कड़ी निंदा। | अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सम्मान पर पूर्ण जोर। | परमाणु खतरों और क्षेत्रीय युद्ध के फैलाव पर सामूहिक रोक। |
| संस्थागत सुधार (UNSC/IMF) | UNSC, IMF और विश्व बैंक में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व का विस्तार। | सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की प्रबल दावेदारी। | ग्लोबल साउथ को वैश्विक नीति-निर्माण में निर्णायक आवाज। |
| स्थानीय मुद्राओं में व्यापार | ब्रिक्स देशों के बीच सीमा पार व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का सीधा उपयोग। | रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण और डिजिटल भुगतान लिंकेज को बढ़ावा। | डॉलर निर्भरता में कमी और वित्तीय स्वायत्तता में वृद्धि। |
| आतंकवाद विरोधी संकल्प | सीमा पार आतंकवाद, वित्तीय पोषण और सुरक्षित पनाहगाहों के खिलाफ कड़ा रुख। | आतंकवाद पर दोहरे मानदंडों को पूरी तरह से खारिज करना। | वैश्विक स्तर पर आतंकी नेटवर्क और फंडिंग पर कड़ा प्रहार। |
| डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर | ब्रिक्स सदस्यों के साथ भारत के यूपीआई और फिनटेक मॉडल को साझा करना। | प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और समावेशी विकास का नेतृत्व। | उभरती अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय समावेशन को तेज रफ्तार। |
परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की कड़ी निंदा और शांति का संकल्प
नई दिल्ली घोषणापत्र का सबसे अहम और संवेदनशील पहलू नागरिक बुनियादी ढांचे और शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों को लेकर व्यक्त की गई गंभीर चिंता है। बिना किसी देश का नाम लिए घोषणापत्र में स्पष्ट कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की पूर्ण सुरक्षा के तहत आने वाले शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर जानबूझकर किए जाने वाले हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन हैं। नेताओं ने संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में परमाणु सुरक्षा बनाए रखने पर बल दिया。
पश्चिम एशिया संकट को लेकर सदस्य देशों ने तुरंत स्थायी संघर्ष विराम और मानवीय सहायता गलियारे खोले जाने की मांग की। घोषणापत्र में कहा गया कि किसी भी विवाद का स्थायी समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीतिक बातचीत और आपसी समझ से ही संभव है। भारत द्वारा दोनों पक्षों के बीच संतुलित भाषा पर सर्वसम्मति बनाना कूटनीतिक दृष्टि से बड़ी सफलता साबित हुआ。
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वित्तीय संप्रभुता को मजबूती
आर्थिक मोर्चे पर 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने बहुध्रुवीय वित्तीय प्रणाली की दिशा में ठोस और ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। सदस्य देशों ने आपसी व्यापार में डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता घटाने और राष्ट्रीय मुद्राओं में सीधा लेन-देन बढ़ाने के व्यापक रोडमैप को मंजूरी दी। इसके तहत सीमा पार भुगतान के लिए उन्नत वित्तीय संदेश प्रणाली और डिजिटल मुद्राओं के सुरक्षित अंतर्संचालन पर सहमति बनी。
भारत ने इस मंच पर अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के वैश्विक प्रसार का प्रस्ताव रखा, जिसका सभी सदस्य देशों ने खुले दिल से स्वागत किया। न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के माध्यम से उभरते देशों में सतत बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए रियायती ऋण देने की प्रतिबद्धता भी दोहराई गई。
द्विपक्षीय वार्ताओं का दौर: मलेशिया और अन्य साझेदार देशों से संवाद
PIB Delhi की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न विश्व नेताओं के साथ व्यापक द्विपक्षीय वार्ताएं कीं। प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स साझेदार देश मलेशिया के प्रधानमंत्री दातो सेरी अनवर बिन इब्राहिम से विशेष भेंट की। दोनों नेताओं ने रक्षा, व्यापार, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था में रणनीतिक सहयोग की विस्तृत समीक्षा की。
मलेशियाई प्रधानमंत्री ने भारत के कोटा किनाबालु (सबा) में नए भारतीय महावाणिज्य दूतावास की स्थापना पर सहमति जताई। इसके अतिरिक्त, वियतनाम, संयुक्त अरब अमीरात और इथियोपिया के शीर्ष नेतृत्व के साथ भी उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठकें आयोजित की गईं。
जलवायु वित्त और विकासशील देशों के न्यायसंगत अधिकार
शिखर सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों पर भी विस्तृत चर्चा हुई। नई दिल्ली घोषणापत्र में विकसित देशों द्वारा जलवायु वित्त और पर्यावरण प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अधूरे वादों पर निराशा व्यक्त की गई। ब्रिक्स देशों ने एक सुर में कहा कि जलवायु कार्रवाई के नाम पर विकासशील देशों पर एकतरफा व्यापारिक प्रतिबंध या अनुचित कार्बन टैक्स लगाना पूरी तरह गैर-वाजिब है। सभी देशों को अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए。
निष्कर्ष: वैश्विक कूटनीति के केंद्र में भारत का कुशल नेतृत्व
समग्र रूप से कहें तो 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और नई दिल्ली घोषणापत्र का सर्वसम्मत अंगीकरण अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की बढ़ती साख और मध्यस्थता क्षमता का जीवंत प्रमाण है। गहरे ध्रुवीकरण के मौजूदा दौर में जब वैश्विक मंच विभाजित नजर आ रहे हैं, भारत ने संवाद और सर्वसम्मति का सफल मार्ग प्रशस्त किया है। यह सम्मेलन स्पष्ट करता है कि भारत अब केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एक न्यायसंगत और समावेशी वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में सबसे अग्रणी विश्व-मित्र की भूमिका निभा रहा है。













