नई दिल्ली / कोलकाता: देश के राजनीतिक और संवैधानिक परिदृश्य में एक बड़े घटनाक्रम के तहत भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) के नाम और उसके ऐतिहासिक चुनाव चिह्न ‘जोड़ा घास फूल’ को तत्काल प्रभाव से फ्रीज कर दिया है। निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर आगामी 6 अक्टूबर 2026 को होने वाले उपचुनावों के मद्देनजर यह अंतरिम आदेश जारी किया। फैसले के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ (Football Player) चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। वहीं बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय के गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ (Envelope) चुनाव चिह्न मिला है। आयोग के इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है。
चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश और सिंबल ऑर्डर 1968 का प्रावधान
The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत यह कार्रवाई की है। जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में दो प्रतिद्वंद्वी गुट पार्टी के नाम और प्रतीक पर दावा पेश करते हैं, तो आयोग अंतरिम उपाय के तौर पर मूल प्रतीक को फ्रीज कर देता है ताकि आगामी चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं में भ्रम न फैले。
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया कि दोनों गुटों के दावों की जांच लंबित रहने तक मूल चुनाव चिह्न किसी भी पक्ष को इस्तेमाल करने की अनुमति পণ্ডিত नहीं दी जा सकती। दोनों पक्षों को 6 अक्टूबर के उपचुनावों के लिए नई पहचान के साथ उतरने का निर्देश दिया गया। हालांकि, ममता बनर्जी गुट का आरोप है कि आयोग ने पार्टी संगठन, संविधान और कार्यकर्ताओं के भारी समर्थन की अनदेखी कर केवल कुछ बागी विधायकों के बयानों के आधार पर यह पक्षपातपूर्ण फैसला लिया है。
तृणमूल विभाजन: दोनों धड़ों को मिले नए नाम और चुनाव चिह्न
निर्वाचन आयोग द्वारा 18 सितंबर 2026 को जारी अधिसूचना के तहत तृणमूल कांग्रेस के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को आवंटित पहचान और नेतृत्व का विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:
| घटक / विवरण | मूल तृणमूल कांग्रेस | ममता बनर्जी धड़ा (आधिकारिक गुट) | ऋतब्रत बनर्जी धड़ा (विद्रोही गुट) |
|---|---|---|---|
| आवंटित नया नाम | ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस | ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस | डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस |
| आवंटित चुनाव चिह्न | जोड़ा घास फूल (अब फ्रीज) | फुटबॉल खिलाड़ी (Football Player) | लिफाफा (Envelope) |
| प्रमुख नेतृत्व | ममता बनर्जी (संस्थापक) | ममता बनर्जी व निष्ठावान सांसद | ऋतब्रत बनर्जी, अरूप रॉय व बागी विधायक |
| दावे का आधार | 1998 में स्थापित राष्ट्रीय दल | संगठनात्मक कार्यसमिति व कार्यकर्ताओं का साथ | विधानसभा में बागी विधायकों का समर्थन |
| उपचुनाव रणनीति | नंदीग्राम व रेजीनगर सीट | कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन का ऐलान | उपचुनाव में प्रत्याशी उतारने की तैयारी |
| कानूनी रुख | पहचान अंतरिम रूप से फ्रीज | आयोग के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी | आयोग के फैसले का स्वागत किया |
ममता बनर्जी की सुप्रीम कोर्ट में याचिका: 10वीं अनुसूची का तर्क
निर्वाचन आयोग के फैसले के बाद ममता बनर्जी ने सर्वोच्च अदालत में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की। याचिका में चुनाव आयोग के आदेश को गैर-कानूनी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया गया है। याचिका में तर्क दिया गया कि आयोग ने पार्टी के सांगठनिक ढांचे और सांसदों की अनदेखी कर सतही तौर पर चुनाव चिह्न फ्रीज करने की जल्दबाजी दिखाई。
याचिका का मुख्य कानूनी पहलू संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) से जुड़ा है। अदालत को बताया गया कि जिन विधायकों के आधार पर बागी गुट ने दावा किया है, उनमें से 10 विधायकों के खिलाफ विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता याचिकाएं लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब तक स्पीकर दल-बदल पर निर्णय नहीं ले लेते, तब तक चुनाव आयोग उन विधायकों के बयानों को वैध मानकर पार्टी विभाजित घोषित नहीं कर सकता。
नंदीग्राम उपचुनाव में सियासी ड्रामा: प्रत्याशी की गिरफ्तारी
NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव चिह्न फ्रीज होने के बाद नंदीग्राम सीट पर सियासी ड्रामा सामने आया। ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान (डे) ने भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद अचानक अपना नामांकन वापस ले लिया। उम्मीदवार के हटने के बाद ममता बनर्जी ने आपात प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के तहत कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया。
ममता बनर्जी ने कांग्रेस को ‘सहोदर दल’ बताते हुए विपक्षी एकता का संदेश दिया। लेकिन इस ऐलान के कुछ ही घंटों बाद बंगाल पुलिस ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को 2007 के पुराने आंदोलन से जुड़े मामले में गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी पर राहुल गांधी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे राजनीतिक प्रतिशोध और लोकतंत्र की हत्या करार दिया। कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि ममता के समर्थन के तुरंत बाद गिरफ्तारी लोकतंत्र को कुचलने का प्रयास है。
महाराष्ट्र के सादिक अली टेस्ट और सुप्रीम कोर्ट की नजीरें
विशेषज्ञों का मानना है कि तृणमूल का संकट महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुए विवादों की याद दिलाता है। चुनाव आयोग ऐसे मामलों में वर्ष 1972 के सादिक अली बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय त्रिसूत्रीय परीक्षण का पालन करता है। इसके तहत दल के उद्देश्य, संगठन में पदाधिकारियों का बहुमत, और निर्वाचित प्रतिनिधियों का संख्याबल आंका जाता है。
महाराष्ट्र मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल विधायी बहुमत के आधार पर मूल दल का फैसला नहीं हो सकता, खासकर जब अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो। अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह अहम सवाल होगा कि क्या आयोग विधानसभा अध्यक्ष के फैसले से पहले बागी विधायकों की गिनती कर सकता है। यदि शीर्ष अदालत अंतरिम आदेश पर रोक लगाती है, तो ममता बनर्जी को उपचुनावों में अपनी मूल पहचान वापस मिल सकती है。
निष्कर्ष: बंगाल की राजनीति और उपचुनावों पर प्रभाव
संक्षेप में, 18 और 19 सितंबर 2026 के इन घटनाक्रमों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। 1998 में स्थापित तृणमूल कांग्रेस के प्रतीक का छिनना पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए बड़ा भावनात्मक झटका है। ममता बनर्जी ने जहां ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चिह्न के साथ संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया है, वहीं बागी गुट लिफाफे के सहारे जमीन तलाश रहा है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और 6 अक्टूबर के उपचुनाव परिणाम तय करेंगे कि बंगाल की राजनीति किस दिशा में जाएगी。













