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अदालतों में जमा अरबों रुपयों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: नया कानून बने

नई दिल्ली: देश की अदालतों और न्यायाधिकरणों में लंबित मुकदमों के दौरान वादियों द्वारा जमा कराई जाने वाली करोड़ों-अरबों रुपये की विशाल धनराशि के प्रबंधन पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कोर्ट-डिपॉजिट्स के तदर्थ प्रबंधन पर गहरी चिंता जताते हुए समूची व्यवस्था को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय कानून बनाने की पुरजोर सिफारिश की है। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि अदालतों में अपील या स्थगन आदेश के लिए जमा कराई गई वादियों की गाढ़ी कमाई को अव्यवस्थित प्रबंधन की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता।

तदर्थ प्रबंधन और वादियों के पैसों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि वर्तमान में देश में कोर्ट-ऑर्डर्ड डिपॉजिट्स को नियंत्रित करने वाला कोई एक समान केंद्रीय कानूनी ढांचा उपलब्ध नहीं है। जब कोई वादी किसी आदेश के खिलाफ ऊपरी अदालत या ट्रिब्यूनल में अपील करता है, तो अदालतें सुरक्षा राशि के रूप में धन जमा करने का निर्देश देती हैं। अब तक अलग-अलग अदालतें और न्यायाधिकरण केस-टू-केस आधार पर इन जमा राशियों और उनके निवेश के संबंध में भिन्न-भिन्न आदेश पारित करते रहे हैं।

इस असंगत प्रक्रिया के कारण हजारों करोड़ रुपये विभिन्न बैंकों में बिखरे पड़े हैं। अलग-अलग बैंकों में ब्याज दरों में भारी अंतर होता है, जिससे फैसले के बाद ब्याज के हिसाब-किताब और भुगतान को लेकर नए विवाद खड़े हो जाते हैं। खंडपीठ ने कहा कि मुद्रास्फीति का दबाव और आर्थिक अनिश्चितताएं इन जमा राशियों पर मिलने वाले रिटर्न को लेकर वादियों की चिंताओं को बढ़ा देती हैं। अदालत ने कहा कि समय के साथ पैसे के मूल्य (Time Value of Money) की रक्षा करना न्यायिक प्रक्रिया का बुनियादी कर्तव्य है।

मौजूदा अव्यवस्था बनाम प्रस्तावित केंद्रीय प्रणाली: मुख्य अंतर

सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेखांकित की गई वर्तमान तदर्थ व्यवस्था और प्रस्तावित वैधानिक सुधारों का तुलनात्मक विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:

मूल्यांकन पैरामीटर वर्तमान व्यवस्था (मौजूदा स्थिति) सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रस्तावित कानूनी मॉडल वादियों और न्यायपालिका को संभावित लाभ
नियामक ढांचा कोई केंद्रीय कानून नहीं; तदर्थ स्थानीय नियम संसद द्वारा पारित व्यापक राष्ट्रीय वैधानिक कानून देश भर की अदालतों व ट्रिब्यूनलों में एकरूपता
फंड प्रबंधन अलग-अलग बैंकों में बिखरी हुई सावधि जमा एकल केंद्रीकृत डिजिटल रजिस्ट्री व एकीकृत पूल वित्तीय जोखिमों से सुरक्षा और पारदर्शी हिसाब
ब्याज दरें व रिटर्न असंगत दरें; महंगाई से मूल्य ह्रास का जोखिम सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) से निश्चित रिटर्न पैसे के समय मूल्य (Time Value of Money) की रक्षा
मुकदमों का बोझ ब्याज गणना और भुगतान पर नए विवादों की बाढ़ स्वचालित ब्याज संचय और डिजिटल खाता प्रणाली अदालतों के समय की बचत और मुकदमों में कमी
अंतरराष्ट्रीय मिसाल असंगठित स्थानीय प्रक्रियाएं अमेरिकी कोर्ट रजिस्ट्री इन्वेस्टमेंट सिस्टम (CRIS) वैश्विक मानकों के अनुरूप आधुनिक व्यवस्था

अदालतों पर मुकदमों का दोहरा बोझ और पेंडेंसी का संकट

LiveLaw कानूनी विश्लेषण के अनुसार, जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस अराधे की पीठ ने जोर दिया कि जमा राशि के प्रबंधन में एकरूपता न होने से अदालतों का कीमती समय बर्बाद हो रहा है। सामान्य मानकों के अभाव में अदालतों को बार-बार निवेश के नवीनीकरण, राशि के निर्धारण और बैंक चयन जैसे प्रशासनिक कार्यों के लिए विशेष आदेश देने पड़ते हैं।

पीठ ने कहा कि जब किसी मुकदमे का अंतिम निपटारा हो जाता है, तब भी पार्टियों के बीच इस बात को लेकर लड़ाई चलती रहती है कि बैंक से कितना ब्याज मिला और उसका हिसाब कैसे हो। इस गैर-जरूरी मुकदमेबाजी से देश भर की जिला अदालतों से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक की पेंडेंसी में अनावश्यक बढ़ोतरी हो रही है। यदि इन जमा राशियों के लिए एक स्वचालित और केंद्रीय तंत्र लागू हो जाए, तो न्यायपालिका पर इस अतिरिक्त बोझ को तत्काल समाप्त किया जा सकता है।

अमेरिकी मॉडल ‘CRIS’ की तर्ज पर केंद्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म का सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या का व्यावहारिक समाधान सुझाते हुए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं का अध्ययन प्रस्तुत किया। शीर्ष अदालत ने विशेष रूप से अमेरिका के संघीय न्यायालयों में संचालित ‘कोर्ट रजिस्ट्री इन्वेस्टमेंट सिस्टम’ (CRIS) का उदाहरण दिया। जस्टिस नरसिम्हा ने समझाया कि अमेरिका में सभी संघीय अदालतें एक एकल केंद्रीकृत क्रिस (CRIS) प्लेटफॉर्म से जुड़ी हैं, जहां जमा होने वाला सारा पैसा स्वतः एक एकीकृत खाते में आ जाता है।

इस केंद्रीकृत फंड के माध्यम से सरकार की आधिकारिक सरकारी प्रतिभूतियों में सुरक्षित निवेश किया जाता है। इस तंत्र में ब्याज का संचय स्वतः होता है, प्रक्रिया पारदर्शी रहती है और आवश्यकता पड़ने पर तत्काल लिक्विडिटी सुनिश्चित होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत में भी ऐसा एकीकृत राष्ट्रीय पोर्टल स्थापित किया जाना चाहिए, जो देश की सभी अदालतों और ट्रिब्यूनलों को एक ही मंच पर जोड़ सके।

विधि आयोग को निर्देश: आरबीआई और वित्त मंत्रालय से परामर्श का आदेश

न्यायिक सुधारों की इस रूपरेखा को ठोस कानूनी रूप देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) से इस विषय का अध्ययन करने का अनुरोध किया है। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि विधि आयोग विकसित देशों में लागू कानूनों और प्रक्रियाओं की पड़ताल करे और भारत के अनुकूल एक संपूर्ण विधेयक तैयार करे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित कानून को व्यावहारिक बनाने के लिए अंतर-मंत्रालयी सहयोग आवश्यक है। इसके तहत विधि आयोग को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), केंद्रीय वित्त मंत्रालय और विधि एवं न्याय मंत्रालय के साथ परामर्श करने का निर्देश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को इस फैसले की प्रति तत्काल विधि आयोग अध्यक्ष, आरबीआई गवर्नर और वित्त तथा कानून सचिवों को भेजने के आदेश दिए गए हैं।

भारतीय न्याय व्यवस्था और आम नागरिकों पर इस फैसले का दूरगामी प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश भारत के न्यायिक इतिहास में वित्तीय सुधारों के लिहाज से एक मील का पत्थर है। देश की अदालतों में इस समय भूमि अधिग्रहण, कॉर्पोरेट विवाद, मोटर दुर्घटना दावे और वाणिज्यिक मध्यस्थता से जुड़ी अरबों रुपये की राशियां जमा हैं। कई मामलों में मुकदमे 15 से 20 साल तक चलते हैं और फैसला आने तक जमा राशि का वास्तविक मूल्य महंगाई के कारण घटकर आधा रह जाता है।

संक्षेप में कहें तो यदि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कानून पारित करती है, तो इससे न केवल वादियों की गाढ़ी कमाई सुरक्षित होगी, बल्कि उन्हें उचित ब्याज भी मिलेगा। इसके साथ ही अदालती कर्मचारियों की जवाबदेही तय होगी और गबन की गुंजाइश समाप्त हो जाएगी। यह सुधार देश में ‘ईज ऑफ जस्टिस’ को आर्थिक सुरक्षा देने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।

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